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पश्चिम से होती हलचल ।
ताप गिरे दिन-रात का, ठंडी बहे बयार ।
ओले पत्थर गिर रहे, बारिस देती मार ।।
सागर के मस्तक पर बल ।
पश्चिम में होती हलचल ।।
शीत-युद्ध सीमांतरी, हो जाता है गर्म ।
चलते गोले गोलियां, शत्रु छेदता मर्म ।।
काटे सर करके वह छल । पश्चिम में होती हलचल ।।
उड़न खटोला चाहिए, सत्ता मद में चूर ।
बटे दलाली खौफ बिन, खरीदार मगरूर ।
चॉपर अब तो तोपें कल । पश्चिम से होती हलचल ।।
भोगवाद अब जीतता, रीते रीति-रिवाज ।
विज्ञापन से जी रहे, लुटे हर जगह लाज ।
पीते घी ओढ़े कम्बल । पश्चिम में होती हलचल ।।
परम्पराएँ तोड़ता, फिर भी दकियानूस ।
तन पूरब का ढो रहा, पश्चिम मन मनहूस ।
बदले मानव अब पल पल ।
पश्चिम में होती हलचल ।।
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बहुत सुंदर, क्या कहने
ReplyDeleteमाई माई कर रहे, महगाई रही मार ।
ReplyDeleteरेट बढ़ा पेट्रोल का ,डीजल की भी धार।
डीजल की भी धार ,मार महगाई जाती ।
कैसा ये ब्यापार ,दिनों -दिन टीस बढ़ाती ।
कहते सुन लोकेश ,किराया बढ़ता जाता ।
जब जाओ बाजार ,किराना महंगा आता ।
बढ़िया प्रस्तुति .रोज़ महंगाई के तोहफे ,और भ्रष्टाचार,देख लो सरकार- को ,है बड़ी लाचार .,करे नित टूजी -कोलगेट ,अरे भई! हेलिकोप्टर ,करो भई रविकर पूर्ती .
ReplyDeleteभावपूर्ण काव्य रचना,आभार.
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