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07 August, 2020

हो न हार उनकी कभी, देते सबको मात

 सार छंद

दया करो हे वीणा पाणी सुन लो विनय हमारी।
सरस-ज्ञान से वंचित हैं हम, हरो मूढ़ता सारी।
महाश्रया मालिनी चंद्रिका वक को हंस बना दो।
उगे हुए कैक्टस अंतर में, सुंदर पद्म खिला दो।।

महाभुजा दिव्यंका विमला, मैले वस्त्र हमारे।
नवल-धवल पट कर प्रदान माँ, ताकि प्राणतन धारे।
देवि ज्ञानमुद्रा त्रिगुणा जय, सुवासिनी की जय हो।
माँ शुभदा शुभदास्तु बोल दो, हमें न किंचित भय हो।।

श्री राम मंदिर के पुनर्निर्माण के साक्षी बने।
विध्वंस का कलिकाल बीता, युग सृजन का सामने।
बलिदान लाखों ने दिया, निज रक्त से सींची धरा-
शत शत नमन हर वीर को,  सादर कहा श्रीराम ने। 

हरिगीतिका छंद
सौम्या सरस्वति शारदा सुरवंदिता सौदामिनी।
प्रज्ञा प्रदन्या पावकी प्रज्या, सुधामय मालिनी।
वागेश्वरी मेधा श्रवनिका वैष्णवी जय भारती।
आश्वी अनीषा अक्षरा रविकर उतारे आरती।।

दोहे
सावन सा  वन-प्रान्त में, क्यों न दिखे उल्लास।
हर-हर बम-बम देवघर, सारा शहर उदास।।

कंधों पर घरबार का, रहे उठाते भार।
आज वायरस ढो रहे, मचता हाहाकार।।

रस्सी जैसी जिंदगी, तने-तने हालात।
एक सिरे पर ख्वाहिशें, दूजे पर औकात ।

होनहार विरवान के, होते चिकने पात।
हो न हार उनकी कभी, देते सबको मात।।

कोरोना योद्धा सतत्, जग को रहे उबार।
हो न हार तो पुष्प से, कर स्वागत सत्कार।।

ट्वेंटी-20 की तरह, निपट रहा यह साल।
लेकिन निपटा भी रहा, रखना अपना ख्याल।।

करें बीस सौ बीस को, हे प्रभु अनइंस्टाल।
इंस्टालिंग फिर से करें, एंटिवायरस डाल।।

अल्कोहल का भी धुला, बदनामी का दाग।
दी समाज ने मान्यता, चल कोरोना भाग।।

कोरोना दहला रहा, नहला रहा *कलाल। 😀
नहले पर दहला पटक, सत्ता करे धमाल।।

रखो देह से देह को, रविकर दो गज दूर।
वरना दो गज भूमि का, पट्टा मिले ज़रूर।।

कोरोना की आ चुकी, नुक्कड़ तक बारात ।
फूफा सा ले मुँह फुला, बन न बुआ बेबात।।

औरत परदे में रहे, कहता था जो मर्द।
मास्क लगाने से उसे, हो जाता सिरदर्द।।

मार्ग बदलने के लिए, यदि लड़की मजबूर |
कुत्ता हो या हो गधा, मारो उसे जरूर।।

जिस लड़की को देखने, जाता वो परिवार। 
उसे अकेले देख ली, लड़की माँग-सँवार।।😀

रोक न पाया एड्स भी, फिसला किये कुलीन।
सद्चरित्र शायद करे, कोविड नाइन्टीन।।

हल्की बातें मत करो, हल्का करो शरीर।
प्राण-पखेरू जब उड़ें, हो न किसी को पीर।।

देह जलेगी शर्तिया, लेकर आधा पेड़।
एक पेड़ तो दे लगा, अब तो हुआ अधेड़।।

कर हल्के तन के लिए,  हर हफ्ते उपवास।
मन हल्का करना अगर, कर हरदिन बकवास।।

मंजिल से बेह्तर मिले, यदि कोई भी मोड़।
डालो तुम डेरा वहीं, वहीं नारियल फोड़।।

☺☺
वास्तु-दोष से मुक्त घर, की पक्की पहचान।
हर कोने हर कक्ष में, हो नेट्वर्क समान ।।

कुंडलियाँ (१)
पहले सा लिखते नहीं, क्यों कविवर अब गीत ❓
प्रेयसी की  शादी हुई, गया जमाना बीत।
गया जमाना बीत, विरह के गीत लिखो फिर ।
भरो दर्द ही दर्द, करोगे अब क्या आखिर।😀
कवि कहता कर क्रोध, बको मत अब गदहे सा।
हुआ उसी से ब्याह, लिखूँ क्या अब पहले सा।।

(२)

माँ कर फेरे तो उगे, शिशु के सिर पर बाल।
पर पत्नी कर फेर के, देती चाँद निकाल।
देती चाँद निकाल, माँद में गरजे बाघिन।
रही रोटियाँ सेक, बेल टकले पर हरदिन।
कह रविकर रिरियाय, हमेशा आँख तरेरे।
दे फेरे में डाल, कहाँ तक माँ कर फेरे।

३)
ताके सोशल-मीडिया, दर्शन-कक्षा श्रेष्ठ ।
शुद्ध-चित्त का आकलन, प्रस्तुत विवरण ठेठ ।
प्रस्तुत विवरण ठेठ, आज की बड़ी जरूरत |
बिन व्यवसायिक लाभ, देश की बदले सूरत |
घटना कहे तुरन्त, सभी से पहले आके |
शिक्षा सत्ता ढोंग, आपदा खेल बता के ||

गीत
१)
धोखे से अरि गालवान में, आकर कर  देता जब हमला।
कुछ सैनिक होते शहीद पर, हर भारतीय सैनिक सँभला।
शिवगण भिड़ते समरांगण में, करें चीनियों का मुँह काला।
आक्रांता की कमर तोड़ कर, वहाँ मान-मर्दन कर डाला।
बीस शहादत के कारण फिर, करे कालिका खप्पर धारण।
रौद्ररूप तांडव का नर्तन, खाली हो जाता समरांगण।।

कुंडलियाँ
समरांगण सारा सजा, उद्दत भारतवर्ष।
टले न टाले चीन से, संभावित संघर्ष।
संभावित संघर्ष, चलो अब हो ही जाये।
करता जो घुसपैठ, नर्क उसको पहुँचाये।
सावधान रे चीन, मौत मत बुला अकारण।
यदि जीवन से मोह, छोड़ हट जा #समरांगण।।

१)
उस माटी की सौगंध तुझे, तन गंध बसी जिस माटी की।
नभ वायु खनिज जल पावक की, संस्कारित शुभ परिपाटी  की ।।
मिट्टी का माधो कह  दुर्जन, सज्जन की हँसी उड़ाते हैं।
मिट्टी डालो उन सब पर जो, मिट्टी में नाम मिलाते हैं।।
चुप रह कर कर्मठ कार्य करें, कायर तो बस चिल्लाते हैं।
कुत्ते मिल सहज भौंकते हैं, हाथी न कभी भय खाते हैं।
गीली मिट्टी का लौंदा बन, मुश्किल है दुनिया में रहना।
छल कपट त्याग रवि रविकर तप, अनुचित बातों को मत सहना।
तुलना सिक्कों पर नही कभी, मिट्टी के मोल बिको प्यारे,
मिट्टी में मिलने से पहले, मिट्टी में शत्रु मिला सारे ।।

२)
रिटायर हो रहे तो क्या, सुबह जल्दी उठा करना।
टहलना भी जरूरी है, तनिक कसरत किया करना।

कमाई जिंदगी भर की, करो कुछ कार्य सामाजिक-
करो निर्माण मानव का, गरीबों पर दया करना।।

न कोई बॉस है तेरा, न कोई मातहत ही है-
बराबर हो गये सारे, परस्पर अब मजा करना।

न छोटे घर बड़े घर का, रहा कोई यहाँ अंतर-
गुजारे के लिए कमरा, कहानी क्या बयां करना।।

मुक्तक

करती रही दुनिया।
मगर काया कफन पाकर परम-संतुष्ट हो जाये।।
फकीरी, बादशाहत क्या, न मेरी है न तेरी है।
तमाचा वक्त का खाकर, तमाशा रुष्ट हो जाये।।

दुखवा कासे कहूँ सखी री, बचपन की है बात।
रहा ताड़ता कॉलेज् में जो, अब डॉक्टर अभिजात।
आँखें लड़ने पर निकली थी, जब-तब जिस की खीस।
मुझे देखने के बदले वह, माँग रहा अब फीस।

झाड़ू लगाने में सदा, आगे बढ़ा जाता बलम।
पोछा करो पीछे खिसक, क्या ये नहीं आता बलम।
क्या काटने से पूर्व भिंडी धो लिया था आपने-😀
बस एक ही सब्जी पका लो, कौन दो खाता बलम।

रहे मापते रिश्तों की हम, लम्बाई चौड़ाई।
करें क्षेत्रफल की गणना फिर, स्वागत और विदाई।
करना ही है माप-तौल यदि, माप आयतन रविकर-
लम्बाई चौड़ाई से भी, बहुत अहम् गहराई।।
चीनी सामान
मेरे पैसे की गोली से, प्राणान्तक आघात करे।
मेरे पैसे की गोली से, सीमा पर मेरा वीर मरे।
नहीं वीरगति पाया है वह, बल्कि किया मैनें हत्या-
धिक्कार मुझे धिक्कार मुझे, क्यों नहीं मुझे चीनी अखरे।।

दोहा
वेतन पा अधिकार पर, लड़ते  सभ्य-असभ्य।
वे तन दे कर देश प्रति, करें पूर्ण कर्तव्य।।

विदाई गीत
विदाई
अलमारियों में पुस्तकें सलवार कुरते छोड़ के।
गुड़िया खिलौने छोड़ के, रोये चुनरियाओढ़ के।

रो के कहारों से कहे रोके रहो डोली यहाँ।
माता पिता भाई बहन को छोड़कर जाये कहाँ।

लख अश्रुपूरित नैन से बारातियों की हड़बड़ी।
लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी।।

हरदम सुरक्षित वह रही सानिध्य में परिवार के।
घूमी अकेले कब कहीं वह वस्त्र गहने धार के।

क्यूँ छोड़ने आई सखी, निष्ठुर हुआ परिवार क्यों।
अन्जान पथ पर भेजते अब छूटता घर बार क्यों।।

रोती गले मिलती रही, ठहरी नही लेकिन घड़ी।
लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी।।

आओ कहारों ले चलो अब अजनबी संसार में।
शायद कमी कुछ रह गयी है बेटियों के प्यार में।

तुलसी नमन केला नमन बटवृक्ष अमराई नमन।
दे दो विदा लेना बुला हो शीघ्र रविकर आगमन।।

आगे बढ़ी फिर याद करती जोड़ती इक इक कड़ी।
लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी।।



03 August, 2020

लोकजीवन में राम

श्री राम कैकेयी सुमित्रा मातु कौशल्या कहो।
सीता अहिल्या सुपनखा मन्दोदरी शबरी अहो।
जय मातु अनुसुइया जयतु जय ताड़का जय मन्थरा।
जय मांडवी जय उर्मिला श्रुतकीर्ति जय पावन धरा।।

इतिहास गोस्वामी लिखे "तुलसी-शतक" तथ्यों भरी।
श्री राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनी थी बाबरी।।
उस मीर बाँकी ने अयोध्या में किया विध्वंश था ।
सरयू हुई थी लाल मुगलों ने दिया जब दंश था।।

इतिहास उन्नति का लिखा, बाँटा परस्पर प्यार जब।
शुभ ग्रन्थ रामायण रचा, पूजा करे संसार सब। 
सम्पत्ति जब बाँटी गयी, अवनति हुई थी तब बड़ी-
रविकर महाभारत छिड़ी, बचता भला फिर कौन कब।।

मुनि श्रेष्ठ चले मिथिलापुर को,  सँग साँवर-गोर कुमार गये।
पग-धूलि लगी जब पाहन पे तब गौतम नारि'क तार गये। 
फुलवारि गये सिय दर्शन पा, दिल से रघुनंदन हार गये।
मन जीत परस्पर राम सिया मन से मन में भर प्यार गये।।

 लोकजीवन में राम 

हरे राम का जाप करे मन, विजयघोष कर जय श्री राम। 
दुख से पीड़ित हाय राम कह, लेता रहे राम का नाम। 
होता रा शब्द विश्व वाचक, ईश्वर वाचक शब्द मकार। 
लोकों के ईश्वर हैं रामा, करवाते भवसागर पार।। 

अंत समय हे राम पुकारे, बापू बाबा हिन्दु तमाम। 
राम नाम ही सत्य सर्वथा, अंत समय दे चिर-आराम।। 
मुँह में राम बगल में छूरी, अवसर पाकर करे हलाल। 
आया राम गया भी रामा, पाला बदले पाकर माल।। 
राम राम कब पढ़े भला वह, बूढ़ा सुग्गा करे बवाल। 
अपनी राम कहानी कहता, सुने न और किसी का हाल।। 
सियाराम मय सब जग जानी, करें परस्पर सुबह प्रणाम। 
राम भरोसे दुनिया भर के, बन जाते हैं बिगड़े काम। 

रखे राम जाही विधि रविकर,  ताही विधि रहते हैं लोग। 
जिसके राम धनी उसको फिर, कौन कमी कर लो उपभोग। 
राम राम ही जपकर दुर्जन, अपना करें पराया माल । 
कर ले सो शुभकाम भले मन, भज ले सो श्री राम कृपाल।
खाली डिब्बे को भी खाली, कहा नहीं जाता श्रीमान्। 
राम राम है उसके अंदर, दे दो यह आध्यात्मिक ज्ञान।। 
दुविधा में दोऊ चल जाते, माया मिली न राम उदार। 
राम नाम में बड़ा आलसी, भोजन में लेकिन हुशियार।। 

कहो कहाँ यह टाँय टाँय है, राम राम की कहाँ पुकार। 
राम मिलाई जोड़ी बढ़िया, इक अंधा इक कोढ़ी यार।। 
राम नाम मणि दीप समाना ,मनुआ श्वाँस श्वाँस उजियार। 
राम ध्यान हो प्रानाप्राना , पाप पुण्य चरणन मे वार।। 
यजन भजन पूजन आराधन, साधक साधन से आनन्द। 
मन आंगन हो जब भुषुण्ड सम , तब मन प्रगटे कौशल चंद।।
राम नाम की लूट मची है, लूट सको तो लूटो भक्त।
वरना अंतकाल पछताना, जब हो जाये देह अशक्त।।

सात-सात हैं पूत राम के, किन्तु काम का एक न दीख।
अगर राम जी की है बकरी, खेत राम जी के हैं सीख। 
खाता को दाता प्रभु रामा, भजते रहो राम का नाम। 
अगर बिगाड़े राम नहीं तो, कौन बिगाड़े रविकर काम।।
जापर कृपा राम जी करते, करे कृपा उसपर संसार।
राम शपथ सत कहूं सुभाऊ, प्रभु की महिमा अपरंपार। 
नाप-तौल-गणना की पहली, गिनती बोली जाती राम । 
बोल सियावर रामचंद्र की, जय जय जयतु अयोध्या-धाम।।

01 August, 2019

मार्ग कंटकाकीर्ण है, जीर्ण-शीर्ण पद-त्राण-

चढ़ा शिखर पर कल कलश, लेकिन आज मलीन।
चमक द्वेष-छल ने लिया, कुछ वर्षों में छीन।।

पनघट पर घटना घटी, मचा भयंकर शोर।
कलस लिए कटि कलसिरी, करे कलह पुरजोर।

नहीं जबरदस्ती सटो, मिले न रविकर चैन।
रहो दूर राजी-खुशी, पथ ताकेंगे नैन।।

हिंसक-पशु से भी बुरा, रविकर कपटी दोस्त।
करे बुद्धि को भ्रष्ट यह, पशु तो नोचे गोश्त।।

हो खुश्बू किरदार में, तब तो होगी नेह।
महकाया क्या इत्र से, रविकर तूने देह।

बगुला निगला गुलगुला, फाँका करता हंस।
कागा-कुल मोती चुगे, हँसे दुशासन-कंस।।

होंठ बड़े शातिर मिले, करे न कुछ परवाह।
चाहे जितना दिल दुखे, किन्तु न भरते आह।।

यह शक्कर की चाशनी, वह चीनी का पाक।
देह-देश के शत्रु दो, रविकर करो हलाक।।

मन की मनमानी खले, रखिये खीँच लगाम ।
हड़बड़ में गड़बड़ करे, पड़ें चुकाने दाम ।।

चुनौतियां देती बना, ज्यादा जिम्मेदार।
जीवन बिन जद्दोजहद, बिना छपा अखबार।।

जब माँ पर करती कटक, वर्तमान बलिदान।
तब भविष्य होता सुखी, होता राष्ट्रोत्थान।।

सदा आत्मघाती हुआ, नैतिकता का पाठ।
शत्रु पढ़ाये सर्वदा, सोलह दूनी आठ।।

करे प्रशंसा मूर्ख जब, खूब बघारे शान।
सुनकर निंदा हो दुखी, तथाकथित विद्वान।।

रविकर तन को दे जला, करे सुमति को भ्रष्ट।
क्रोध-अग्नि को मत दबा, दे बहुतेरे कष्ट।।

बना क्रोध भी पुण्य जब, झपटा गिद्ध जटायु।
मौन साधना, भीष्म का, कौरव की अल्पायु।।

पद पाकर पगला गए, रविकर कई पदस्थ।
पद-प्रहार औषधि सही, उन्हें रखे जो स्वस्थ।।

नित्य वेदना बढ़ रही, करे सटीक उपाय।
पढ़े वेद नाना सतत, होते राम सहाय।।।

खाली घर शैतान का, बैठे-ठाले सोच।
करूँ खाट किसकी खड़ी,लूँ किसका मुँह नोच।।

पढ़ें वेद नाना सतत, सिद्ध करें वे स्वार्थ ।
रविकर पढ़कर वेदना, करे प्राप्त परमार्थ।।

बाँध बहे, बादल फ़टे,चक्रवात तूफान।
धनी पकौड़े खा रहे, खाये जहर किसान।।

ऐसा वन देखा कहाँ, ऐ सावन के सूर।
जहाँ हरेरी की जगह, भगवा हो भरपूर।।

मार्ग कंटकाकीर्ण है, जीर्ण-शीर्ण पद-त्राण।
मिले परम्-पद किस तरह, देते भक्त प्रमाण।।

हुआ इश्क नाकाम तो, कर ले मौज तमाम।
किन्तु मुकम्मल यदि हुआ, रहें चुकाते दाम।।

इश्क मुकम्मल यदि हुआ, हो शर्तिया विवाह।
हुआ इश्क नाकाम तो, अब तक है उत्साह।।




08 July, 2019

कुछ व्यंजनों के प्राण निकलें, सुन स्वरों की व्यंजना-

बाधाओं से क्यों डरे, रे जिंदा इन्सान।
अर्थी के पथपर कभी, आते क्या व्यवधान ??

जब चोट जिभ्या पर लगे, उपचार क्या करना अहो।
वह खुद-ब-खुद ही ठीक होगी, बस जरा पीड़ा सहो।
यदि चोट जिभ्या से लगे, उपचार ही कोई नहीं-
बस पीर प्राणान्तक सहो, सहते रहो कुछ मत कहो।।

😊😊
बी पी अनिद्रा चिड़चिड़ापन, और बेचैनी अगर।
दो बार सिर से हाँ करो, अर्धांगिनी की बात पर।
दायें नहीं बाएं नहीं मुंडी हिलाना तुम कभी-
सबसे बड़ा योगा यही, घर मे नियम से रोज कर।।
😊😊
कांता रखे आराम से सिर वक्ष पर एकांत में।
मेरे सिवा वह कौन नारी रुचि रखे जो आपमें।
बेशक प्रत्युत्तर है सही कोई नही कोई नही-
पर कर न दे चुगली मियाँ, दिल की बढ़ी धड़कन कहीं।

मुस्कुराहट में छुपे हर दर्द को पहचानता।
रोष के पीछे छुपे उस प्यार को भी जानता।
मौन का कारण पता है, किन्तु कैसे बोल दूँ।
आ रही आड़े हमारे बीच की असमानता।।

जरूरत कभी भी न पूरी हुई, सदा नींद भी तो अधूरी हुई।
अरी मौत तेरा करूँ शुक्रिया, जरूरत खतम नींद पूरी हुई।।

सुगर अवसाद प्रेसर का, बता अंजाम क्या होगा।
लगाई पंक्ति प्रातः ही, मगर डॉक्टर करे योगा-
दवा की लिस्ट लम्बी सी, दिया फिर चार सौ लेकर-
बदल ली किन्तु दिनचर्या, तिलांजलि लिस्ट को देकर।।

नशे में बुद्धिजीवी सब, दलाली मीडिया करता।
मदान्धी हो रही सत्ता, कुकर्मी कब कहाँ डरता।
तमाशा देखती जनता, नपुंसक हो चुकी अब तो-
अगर है जागरुक कोई, वहाँ भी आह वह भरता।।

कुछ व्यंजनों के प्राण निकलें, सुन स्वरों की व्यंजना।
अभिव्यंजना की हर समय, मात्रा करे आलोचना।
मात्रा लवण की यदि उचित तो स्वाद व्यंजन का बढ़े-
रख वाक्य में मात्रा उचित, कवि मन्त्र देते है बना।।

19 June, 2019

लगता क्या कुरुक्षेत्र, हमारे अब्बू का घर-

घर मेरे माँ-बाप का, बेगम करे बखान।
झगड़ा मत करना यहाँ, रखना सबका मान।
रखना सबका मान, मियाँ का चढ़ता पारा।

बात तुम्हारी ठीक, बोलकर ताना मारा।

क्यों देती हो छेड़, वहाँ पर झगड़ा अक्सर।

लगता क्या कुरुक्षेत्र, हमारे अब्बू का घर।।
(2)

😊😊😊😊😊😊😊😊😊नहला
मेरे पिताजी का भवन, घुसते हुए पत्नी चे'ताई।
अब ठीक रखना मूड अपना, मत यहाँ करना लड़ाई।

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊दहला
लगता तुम्हे कुरुक्षेत्र क्या, #मेरे #पिता #का #घर कहो।
गाहे-बगाहे छेड़ देती जो महाभारत अहो।।

(3)

😊😊
ज्यों होश में आई प्रसूता, खूब उत्सुकता दिखाई।
कुछ खोजते जब नर्स देखी, पालने से शिशु उठाई।।
मैं शिशु नहीं निज फोन खोजूं, प्लीज जल्दी दीजिये।
#स्टेटस लगाना #फेसबुक पर, और लेनी है बधाई।।

😊😊😊

प्राप्त की दो भ्रूण-हत्या कर मनौती पर जिसे।
भेज वृद्धाश्रम गया था, कल वही बालक उसे।
जाते हुवे उस पुत्र को वह रोकती आवाज दे-
बोझ मत रखना हृदय पर, बोली हकीकत पुत्र से।।

सुगर अवसाद प्रेसर का, बता अंजाम क्या होगा।
लगाई पंक्ति प्रातः ही, मगर डॉक्टर करे योगा-
दवा की लिस्ट लम्बी सी, दिया फिर चार सौ लेकर-
बदल ली किन्तु दिनचर्या, तिलांजलि लिस्ट को देकर।।


कुछ व्यंजनों के प्राण निकलें, सुन स्वरों की व्यंजना।
अभिव्यंजना की हर समय, मात्रा करे आलोचना।
मात्रा लवण की यदि उचित तो स्वाद व्यंजन का बढ़े-
रख वाक्य में मात्रा उचित, कवि मन्त्र देते है बना।।


नशे में बुद्धिजीवी सब, दलाली मीडिया करता।
मदान्धी हो रही सत्ता, कुकर्मी कब कहाँ डरता।
तमाशा देखती जनता, नपुंसक हो चुकी अब तो-
अगर है जागरुक कोई, वहाँ भी आह वह भरता।।


चुनावों में गुनाहों की नहीं चिंता करे कोई।
बयानों की झड़ी लगती, न ई. सी. से डरे कोई।
कहीं विस्फ़ोट बमबाजी कहीं पत्थर चलाते हैं-
करे कोई भरे कोई, जिये कोई मरे कोई।।


कहती गर्मी ऊन की, मैं तो सबसे गर्म।
सुनकर उबले खून तो, कहे सूत बेशर्म।
कहे सूत बेशर्म, देख लो सड़कें सूनी।
मैं हूँ सबसे गर्म, बोलता एक जुनूनी।
लेकिन आया जून, गर्म लू बहती रहती।
त्राहिमाम् का शोर, बचा लो दुनिया कहती।।


सेल्सगर्ल की कामना, बिक जाएँ कुछ कार।
वरना देगी फर्म यह, मेरे वस्त्र उतार। (मुहावरा)
मेरे वस्त्र उतार, कहे इक कॉलगर्ल तब।
बिके अन्यथा कार, दूसरा मार्ग नहीं अब।
अजब-गजब हालात, कामना कॉल गर्ल की।
कह रविकर वह फिक्र, बने अब सेल्सगर्ल की ।


हँसकर वह मैके गई, परेशान श्रीमान।
रखी कहाँ कंडोम तुम, पूछा उसी विहान।
पूछा उसी विहान, फोन पत्नी को करके।
मिले नहीं कंडोम, पास में मेरे घर के।
इसीलिए मैं साथ, बैग में लाई रखकर।
पटक रहा पति माथ, कही जब पत्नी हँसकर। ।।


आया मेरा फोन यदि, राज न देना खोल।
मेरे पति घर पर नहीं, झट से देना बोल।
झट से देना बोल, फोन आया ज्यों रविकर।
घर पर हैं पतिदेव, दिया पत्नी ने उत्तर।
पति करता जब क्रोध, उसे उसने समझाया।।
नहीं तुम्हारा फोन, फोन तो मेरा आया ।।

मुस्कुराहट में छुपे हर दर्द को पहचानता।
रोष के पीछे छुपे उस प्यार को भी जानता।
मौन का कारण पता है, किन्तु कैसे बोल दूँ।
आ रही आड़े हमारे बीच की असमानता।।

जरूरत कभी भी न पूरी हुई, सदा नींद भी तो अधूरी हुई।
अरी मौत तेरा करूँ शुक्रिया, जरूरत खतम नींद पूरी हुई।।