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02 December, 2018

तुम तो मेरी शक्ति प्रिय-

जब से झोंकी आँख में, रविकर तुमने धूल।
अच्छे तुम लगने लगे, हर इक अदा कुबूल।।

भाषा वाणी व्याकरण, कलमदान बेचैन।
दिल से दिल की कह रहे, जब से प्यासे नैन।।

जिसपर अंधों सा किया, लगातार विश्वास।
अंधा साबित कर गया, रविकर वह सायास।।

नहीं हड्डियां जीभ में, पर ताकत भरपूर |
तुड़वा सकती हड्डियां, देखो कभी जरूर ||

तुम तो मेरी शक्ति प्रिय, सुनती नारि दबंग।
कमजोरी है कौन फिर, कहकर छेड़ी जंग।।

पत्नी पूछे हो कहाँ, कहे पड़ोसन पास।
वो फिर बोली 'किस'-लिए, पति बोला यस-बॉस।।

मार्ग बदलने के लिए, यदि लड़की मजबूर |
कुत्ता हो या आदमी, मारो उसे जरूर ||

देह जलेगी शर्तिया, लेकर आधा पेड़।
एक पेड़ तो दे लगा, दे आंदोलन छेड़।।

वृक्ष काट कागज बना, लिखते वे सँदेश |
"वृक्ष बचाओ" वृक्ष बिन, बिगड़ेगा परिवेश ||

मिला कदम से हर कदम, चलते मित्र अनेक।
कीचड़ किन्तु उछालते, चप्पल सम दो-एक।।

सम्बन्धों के मध्य में, आवश्यक विश्वास।😊
करो सुनिश्चित वो कहीं, जाय न पत्नी पास।।

पैर न ढो सकते बदन, किन्तु न कर अफसोस।
पैदल तो जाना नही, तत्पर पास-पड़ोस ।।

अरे भगोने चेत जा, ये चमचे मत पाल |
झोल छोड़कर वे सभी, लेंगे माल निकाल ||

कंगारू सी मैं बनूँ, दे दो प्रभु वरदान।
ताकि फोन हो हाथ मे, थैली में सन्तान।।

बेमौसम ओले पड़े, चक्रवात तूफान।
धनी पकौड़ै खा रहे, खाये जहर किसान।।

चाय नही पानी नही, पीता अफसर आज।
किन्तु चाय-पानी बिना, करे न कोई काज।।

दिनभर पत्थर तोड़ के, करे नशा मजदूर।
रविकर कुर्सी तोड़ता, दिखा नशे में चूर।।

चुरा सका कब नर हुनर, शहद चुराया ढेर।
मधुमक्खी निश्चिंत है, छत्ता नया उकेर।।

आँधी पानी बर्फ से, बचा रही जो टीन।
ताना सुनती शोर का, ज्यों गार्जियन-नवीन।।

जिस सुर में माँ-बाप को, देते तुम आवाज।
पुत्र उसी सुर का करे, रविकर नित्य रियाज।।

श्याम सलोने सा रहा, सुंदर रविकर बाल ।
भैरव बाबा दे बना, सांसारिक जंजाल।।

सोना सीमा से अधिक, दुखदाई है मित्र।
चोर हरे चिन्ता बढ़े, बिगड़े स्वास्थ्य चरित्र।

टूटे यदि विश्वास तो, काम न आये तर्क।
विष खाओ चाहे कसम, पड़े न रविकर फर्क।।

होती पाँचो उँगलियाँ, कभी न एक समान।
मिलकर खाती हैं मगर, रिश्वत-धन पकवान ।।

बड़ा नही धन से बने, मन्सूबे मत पाल।
तेल मसाला ले नमक, दही उड़द की दाल।|

पहली कक्षा से सुना, बैठो तुम चुपचाप।
यही आज भी सुन रहा, शादी है या शाप।।

रहा तरस छह साल से, लगे निराशा हाथ |
दिखी आज आशा मगर, दो बच्चों के साथ ||

जाग चुका अब हर युवा, करे पतंजलि पेस्ट।
बिना डेढ़ जीबी पिये, कभी न लेता रेस्ट।।

दल के दलदल में फँसी, मुफ्तखोर जब भेड़ ।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उसका ऊन उधेड़ ।।

गली गली गाओ नहीं, दिल का दर्द हुजूर।
घर घर मरहम तो नही, मिलता नमक जरूर।।

चंद चुनिंदा मित्र रख, जिंदा रख हर शौक।
ठहरेगी बढ़ती उमर, करे जिक्र हर चौक।|

शीलहरण पे पढ़ रही, भीड़ व्याह के मन्त्र |
सहनशील-निरपेक्ष मन, जय जय जय जनतंत्र ||

अधिक आत्मविश्वास में, इस धरती के मूढ़ |
विज्ञ दिखे शंकाग्रसित, यही समस्या गूढ़ ||

सुबह-शाम सुलगा रहे, धूप-अगर-लुहबान |
मच्छर क्यों भागे नहीं, क्यों न दिखे भगवान् ||

धर्म-कर्म पर जब चढ़े, अर्थ-काम का जिन्न |
मंदिर मस्जिद में खुलें, नए प्रकल्प विभिन्न ||

धनी पकड़ ले बिस्तरा, भाग्य-विधाता क्रूर ।
ले वकील आये सगे, रखा चिकित्सक दूर।।

घूम घूम कर बेचता, ग्वाला दूध उधार।
ढूंढ ढूंढ मदिरा नगद, किनता किन्तु बिहार।।

चले शूल पर तो चुभा, जूते में बस एक।
पर उसूल पर जब चले, चुभते शूल अनेक।।

नोटों की गड्डी खरी, ले खरीद हर माल।
किन्तु भाग्य परखा गया, सिक्का एक उछाल।।

रविकर रोने के लिए, मिले न कंधा एक।
चार चार कंधे मिले, बिलखें आज अनेक।।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

पूरे होंगे किस तरह, कहो अधूरे ख्वाब।
सो जा चादर तान के, देता चतुर जवाब।।

रविकर अच्छे कर्म कर, फल की फिक्र बिसार।
आम संतरा सेब से, पटे पड़े बाजार।।

खले मुखर की वाह तब, समझदार जब मौन।
काव्य शक्ति-सम्पन्न तो, कवि को भूले कौन।।

दर्पण जैसे दोस्त की, यदि पॉलिस बदरंग।
रविकर छोड़े शर्तिया, प्रतिछाया भी संग।

लेडी-डाक्टर खोजता, पत्नी प्रसव समीप।
बुझा बहन का जो चुका, रविकर शिक्षा-दीप।।

अपनी गलती पर बने, रविकर अगर वकील।
जज बन के खारिज़ करे, पत्नी सभी दलील।।

किया बुढ़ापे के लिए, जो लाठी तैयार।
मौका पाते ही गयी, वो तो सागर पार।

फूँक मारके दर्द का, मैया करे इलाज।
वह तो बच्चों के लिए, वैद्यों की सरताज।

चक्षु-तराजू तौल के, भार बिना पासंग।
हल्कापन इन्सान का, देख देख हो दंग।।

चुरा सका कब नर हुनर, शहद चुराया ढेर।
मधुमक्खी निश्चिंत है, छत्ता नया उकेर।।

हर मकान में बस रहे, अब तो घर दो चार।
पके कान दीवार के, सुन सुन के तकरार।।

मेरे मोटे पेट से, रविकर-मद टकराय।
कैसे मिलता मैं गले, लौटा पीठ दिखाय।।

रिश्ते 'की मत' फ़िक्र कर, यदि कीमत मिल जाय।
पहली फुरसत में उसे, देना तुम निपटाय।।

नौ सौ चूहे खाय के, बिल्ली हज को जाय।
चौराहे पर बैठ के, गिनती बूढ़ी गाय।।

कुल के मंगलकार्य में, करे जाय तकरार।
हर्जा-खर्चा ले बचा, चालू पट्टीदार ।।

अपने मुंह मिट्ठू बनें, किन्तु चूकता ढीठ।
नहीं ठोक पाया कभी, रविकर अपनी पीठ।।

अजगर सो के साथ में, रोज नापता देह।
कर के कल उदरस्थ वह, सिद्ध करेगा नेह।।

खड्ग तीर चाकू चले, बरछी चले कटार।
कौन घाव गहरा करे, देखो ताना मार ।।

नोटों की गड्डी खरी, ले खरीद हर माल।
किन्तु भाग्य परखा गया, सिक्का एक उछाल।।

मजे मजे मजमा जमा, दफना दिया जमीर |
स्वार्थ-सिद्ध सबके हुवे, लटका दी तस्वीर ||

झूठे दो-दो चोंच कर, लड़ें चोंचलेबाज |
एक साथ फिर बैठते, करे परस्पर खाज ||

अगर वेद ना पढ़ सके, कर ले 'रविकर' जाप । 
व्यक्ति-वेदना पढ़ मगर,  हर उसका संताप ।।

बेलन ताने नारि तो, चादर तानें लोग |
ताने मारे किन्तु जब, टले  कहाँ दुर्योग ||

जाति ना पूछो साधु की, कहते राजा रंक |
मजहब भी पूछो नहीं, बढ़ने दो आतंक ||  

मयखाने में शाम को, जो कुछ आया भूल।
सुबह-सुबह पहुँचा गया, रविकर नामाकूल।।😊

घड़ियों के रिश्ते-सुई, रहें परस्पर मग्न।
घड़ी घड़ी मिलते नहीं, किन्तु सदा संलग्न।।

टेढ़ा पति सीधा हुआ, टेढ़ी रोटी गोल।।
गोल-गोल इस यंत्र का, नाम न रविकर खोल।।

रविकर जीवन-पुस्तिका, पलटे पृष्ट हजार।
वैसे के वैसे मिले, शब्द-अर्थ हर बार।।

खुद से नाड़ा बाँध ले, वो ही बाल सयान।
ढीला होने दे नहीं, वही तरुण बलवान।।

आत्म-मुग्ध विद्वान का, उस विमूढ सा हाल।
बैठ गधे पर जो चले, सिर पर उठा बवाल।।

जब #दारू हर सोच को, करे प्रकट बिंदास।

तब अपनी #दारा करे, बन्द सकल बकवास।।

26 November, 2018

तो व्यक्ति सचमुच में सफल है-

शिशु चार वर्षों का अगर, चड्ढी नहीं गीली करे। यदि वृद्ध अस्सी साल का, पतलून ना पीली करे। हो आठ वर्षों का बदन या हो पचहत्तर साल का। यदि खुद ब खुद वह हाट से घर लौट कर नित आ सका। तो व्यक्ति सचमुच में सफल है। कल कल रहा था आज कल है।। जो मित्र बारह में बनाये, याद सत्तर तक रहे। दुख सुख हमेशा साथ बाँटे, सँग लगाये कहकहे। सिगरेट दारू से युवा जब दूर अपने आप है। पैसठ बरस में है निरोगी, कुछ नहीं सन्ताप है।। तो व्यक्ति सचमुच में सफल है। कल कल रहा था आज कल है।। पच्चीस में होता युवा, यदि स्वयं पैरों पर खड़ा। कर्तव्य सारे साठ में निपटा दिए तो वह बड़ा। परिवार पैंतिस में बढ़ाया, धन कमाया नाम भी। पच्चास का रविकर युवा, करता समाजिक काम भी।। तो व्यक्ति सचमुच में सफल है। कल कल रहा था आज कल है।।

21 November, 2018

मुक्तक,

किसी की माँ पहाड़ों से हुकूमत विश्व पर करती।
बुलावा भेज पुत्रों के सिरों पर हाथ है धरती।
किसी की मातु मथुरा में भजन कर भीख पर जीवित
नहीं सुत को बुला पाती, अकेली आह भर मरती ।।
कभी पूरी कहाँ होती जरूरत, जिंदगी तेरी।
हुई कब नींद भी पूरी, तुझे प्रत्येक दिन घेरी।
करे जद्दोजहद रविकर, हुई कल खत्म मजबूरी।
अधूरी नींद भी पूरी, जरूरत भी हुई पूरी।

अच्छे विचारों से हमेशा मन बने देवस्थली।
शुभ आचरण यदि हैं हमारे, तन बने देवस्थली।
व्यवहार यदि अच्छा रहे तो धन बने देवस्थली।
तीनो मिलें तो शर्तिया, जीवन बने देवस्थली।।

किसी का दिल दुखाकर के तुम्हें यदि चैन आता है।
किसी को चोट पहुँचाना, तुम्हे यदि खूब भाता है।
मिलेगा शर्तिया धोखा, सुनो चेतावनी देता-
दुखेगा दिल तुम्हारा भी, तुम्हे रविकर बताता है।।

हवा को शुद्ध करके तरु-मनुज फल-फूल देते जब।
प्रदूषण-मुक्त परिसर कर क्षरण लू रोक लेते तब।
लड़े तूफान से भरदम, कहीं यदि गिर गये तो भी
करें कल्याण दुनिया का, कहाते देहदानी अब।।
हुआ यूँ शान्तिमय जीवन, तड़प मिट सी गई तन की।
सहन ताने करे नियमित, व्यथा कैसे कहे मन की।
सवेरे काम पर जाता, अँधेरे लौटकर आता-
मशीनी आदमी रविकर, मगर दुनिया कहे सनकी।।

खुशी तो हड़बड़ी में थी, घरी भर भी नहीं ठहरी।
मगर गम को गजब फुरसत, करे वो मित्रता गहरी।।
उदासी बन गयी दासी दबाये पैर मुँह बाये
सितारे रात भर गिनता, कटे काटे न दोपहरी।।

सूर्य की किरणें प्रखर जग-जिन्दगी जग-मग करें।
चंद्र किरणें भी सदा श्रृंगार कर रौनक भरें। 
किन्तु #आशा की #किरण से जिन्दगी आगे बढ़े-
अन्यथा अवसाद आये, और हम यूँ ही मरें।।

अगरचे दूर मंजिल तो, जरूरी पैर में दमखम।
चलेगा देर तक कैसे, इरादों में अगर बेदम।
मगर असहाय रविकर को, भरोसा ईष्ट-मित्रों पर
उठाने हेतु कंधो पर, रहें तैयार जो हरदम।।

हस्त बिन हस्ती दिखा जाते कई।
पद बिना भी दौड़कर दुनिया गई।
अस्तित्व यदि अपनी नजर में है सुनो-
पद सिफारिश बिन मिले मंजिल नई।।

शिव की जटा ने तीव्र-धारा खूब धारा।
उद्दंड पुरखों को भगीरथ-कर्म तारा।
बेहद सफाई से करे सत्ता सफाई-
खरदूषणों ने पर, दुशासन संग मारा।।


गिद्ध की ख्वाहिस यही, हों हरतरफ लाशें पड़ी।

उल्लुओं को तो हमेशा, रोशनी से चिढ़ बड़ी।
भुखमरी बेरोजगारी जातिगत संघर्ष की
याचना करती सियासत, आँख कुर्सी पर गड़ी।।



फूलता फलता सफलता के शिखर पर चढ़ रहा।

योग्यता श्रम से सुनहरा कल स्वयं से गढ़ रहा।
माँ-पिता भाई-बहन से भेंट करना भूलता-
मुस्कुराना भूलता तो दोष उनपर मढ़ रहा।।



खटकता है अगर कोई, उसे चुपचाप छोड़ो तुम।

करे खटपट अगर तब भी, उसे धोकर निचोड़ो तुम।
मगर नाराज यदि अपने, रहो नित खटखटाते दिल-
कभी कोशिश नहीं छोड़ो, पुनः सम्बन्ध जोड़ो तुम।।



मगर से बैर है रविकर, मगर यह झील मज़बूरी |

जरुरी सावधानी है, बनाकर वह रखे दूरी |
मगर उस मत्स्य-कन्या ने, बनाया मित्र बगुले को-
उड़ाकर ले गया बगुला, बिताई शाम अंगूरी ||



अभिजात अंग्रेजी बके, हिंदी हमारी शान है |

सौ फीसदी अंग्रेजियत में किन्तु हिन्दुस्तान है |

#मेक'प अगर बढ़िया करे, #दारू अगर ज्यादा चढ़े-, 

तो मात्र #अंग्रेजी #बके#बेगम किंवा #सुलतान है |
(2)
हाथी हिरण वनराज गैंडे आज संरक्षित सभी।
कुछ अन्य अभयारण्य की, लेकिन जरूरत है अभी।
प्रतिबन्ध पशुवध पर मगर, #इंसान #मारे जा रहे-
इनके लिए होगी सुरक्षित क्या जगह कोई कभी।
(3)
#खोखली काया हुई मस्तिष्क भी #भोथर हुआ।
हड्डियाँ तक गल गयीं, जाता नहीं खुद को छुआ।
क्यों कहूँ कैसे कहूँ, इंसान #खस्ताहाल है-
हे प्रभो कर दो दया, हे मित्रगण दे दो दुआ।।



1)

निष्प्राण-मानव से कभी तुम प्रश्न तो पूछो सही।
है कौन सी पीड़ा असह्य, जो अब उसे तड़पा रही।
अफसोस कर वह अश्रु पीकर तो बकेगा शर्तिया-
बेकार जीवन कर दिया, है मुझे पीड़ा यही।।
(बेकार जीवन कर दिया क्यों, क्यों नहीं दारू पिया)
(2)
अखरती जिंदगी फिर भी, सदा वह मौत से डरता।
मगर जो मोक्ष चाहे वो, भला उच्छ्वास कब भरता।
अनिश्चित जिंदगी पर क्यों मचाता हाय-तौबा तू।
सुनिश्चित मौत की रविकर, मगर तैयारियाँ करता।।



घड़ी उपहास करती है, समय का हरसमय रविकर।

बड़ी सी बात करती है, सभी के साथ वह अक्सर।
समय बदलाव का धन है नहीं झुठला सके कोई-
करो इसकी सुरक्षा तो, बनेगी जिन्दगी बेह्तर।।।



काफी दिनों के बाद पूछी, आप कैसे हो कहो।

दिल में जलन, हैं लाल आँखे, सास क्यों उखड़ी अहो।
क्या प्यार में हो आज तक , अब भी मुझे भूले नहीं
दिल्ली शहर से आ रहा, औकात में तुम तो रहो।।



दाल रोटी नौकरी परिवार की चिंता करूँ।

#आफलाइन जब तलक घर-बार की चिंता करूँ।
#आनलाइन क्या हुआ, हर सोच #ग्लोबल हो गयी-
फिर सियासत धर्म की संसार की चिंता करूँ।।



प्राय: परायों से पराजय, पीर पाकर हम पड़े।

परतंत्र भी करते पराये, युद्ध भी यद्यपि लड़े।
लेकिन पतन होता सदा, रविकर स्वयं के दोष से ।
है #पाक के #आतंकियों से, पाक को खतरे बड़े।।



अति-व्यस्त हो या मूर्ख हो या हो अहंकारी बड़ा।

मत मित्रता इनसे करो, लो फैसला इनपर कड़ा।
फुरसत कहाँ है व्यस्त को, तो हर घमण्डी मतलबी-
विद्वान दुश्मन मूर्ख दोस्तो पर सदा भारी पड़ा।।



मातु लक्ष्मी को नमन, रविकर सफल जीवन करें।

स्वास्थ्य-उत्तम बुद्धि-निर्मल ज्ञान-अनुपम नित भरें।
रिद्धि सुख समृद्धि दे, दे सिद्धि शुभ दीपावली।
विघ्न-बाधा व्याधियाँ विघ्नेश धनवन्तरि हरें।


😂

बेटी के' हाथों में रहे, माँ-बाप की इज्जत सदा।
चाहे सँभाले या उछाले, राम जाने क्या बदा।
नालायकों के हाथ में, परिवार की कुल सम्पदा।
चाहे बढ़ायें या उड़ायें, फर्ज रविकर कर अदा।।



तज़रबा नाम शाला का, लिया कल दाखिला बाबू

चुकाता फीस साँसो से, शुरू है सिलसिला बाबू।।
पढ़ाई कर रहा नियमित, नकल-कल का भरोसा क्या-
मगर था प्रश्न बाहर का, नहीं उत्तर मिला बाबू।

15 October, 2018

वे पुत्रवधु के हाथ से पानी न पायेंगे कभी-

करके परीक्षण भ्रूण-हत्या कर रहे जो नर अभी।
वे पुत्रवधु के हाथ से पानी न पायेंगे कभी।
कोई कहीं दुर्गा अगर, अब देश में रविकर मरी

तो पाप का परिणाम दुष्कर, दंड भोगेंगे सभी ।


मजबूर होकर पाठशाला छोड़ती यदि शारदा।
करना सुनिश्चित नारि-शिक्षा हाथ में लेकर गदा।
लक्ष्मी कभी क्यों खर्च माँगे, सुत पिता पति भ्रात से
उपलब्ध उसको भी रहे, घरबार दौलत सम्पदा।।

क्यों कुंड में कोई उमा, बाजी लगाये जान की।
क्यों अग्नि लेती है परीक्षा, जानकी के मान की।
काली बने अब कालिका, संहार दुर्जन का करे।
नवरात्रि की पूजा तभी होगी सफल इन्सान की।।

भयंकर युद्ध के परिणाम का दुख द्रौपदी झेली।
हुई कृशकाय वृद्धा सी, रही जो नारि अलबेली।
शिविर में कृष्ण ज्यों आये विलख कर पूछ बैठी वह
कहो क्यों कोप विधना ने किया क्यों खेल यह खेली।।

कृष्ण उवाच
सखी क्यों कर्ण को तुमने स्वयंवर से भगाया था।
स्वयंवर जीतकर अर्जुन बुआ के पास लाया था।
बनी क्यों पाँच की पत्नी, मना क्यों कर नहीं पाई-
हँसी खुदपर नहीं आई, सुयोधन पर हँसी आई।।

अच्छे विचारों से हमेशा मन बने देवस्थली

कभी पूरी कहाँ होती जरूरत, जिंदगी तेरी।
हुई कब नींद भी पूरी, तुझे प्रत्येक दिन घेरी।
करे जद्दोजहद रविकर, हुई कल खत्म मजबूरी।
अधूरी नींद भी पूरी, जरूरत भी हुई पूरी।


अच्छे विचारों से हमेशा मन बने देवस्थली।
शुभ आचरण यदि हैं हमारे, तन बने देवस्थली।
व्यवहार यदि अच्छा रहे तो धन बने देवस्थली।
तीनो मिलें तो शर्तिया, जीवन बने देवस्थली।।

किसी का दिल दुखाकर के तुम्हें यदि चैन आता है।
किसी को चोट पहुँचाना, तुम्हे यदि खूब भाता है।
मिलेगा शर्तिया धोखा, सुनो चेतावनी देता-
दुखेगा दिल तुम्हारा भी, तुम्हे रविकर बताता है।।


किसी की माँ पहाड़ों से हुकूमत विश्व पर करती।
बुलावा भेज पुत्रों के सिरों पर हाथ है धरती।
किसी की मातु मथुरा में भजन कर भीख पर जीवित
नहीं सुत को बुला पाती, अकेली आह भर मरती ।।

कभी क्या वक्त रुकता है, घड़ी को बंद रखने से ।
कभी क्या सत्य छुपता है, अनर्गल झूठ बकने से।
रुके फिर क्यों कभी कविता, सतत् बहती रहे अविरल
नहीं चूके बुराई पर, कभी कवि चोट करने से।।

करीने से सजा करके, चिता मेरी जलाई थी।
सितमगर हाथ भी सेंकी, धुँवे से तिलमिलाई थी।
मुहब्बत फिर शुरू कर दी, कदम पीछे हटाकर वो- 
उडी जब राख रविकर की, उठाकर फूल लाई थी ।।


जलेगी देह जब तेरी जलेगा पेड़ भी आधा।
लगा दे पेड़ दो ठो तो, कटेगी प्रेत-भवबाधा।
अगर दो वृक्ष का रोपण लगे भारी तुझे रविकर
बदन ही दान तू कर दे, करेंगे शोध ही डाक्टर।।