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01 August, 2019

मार्ग कंटकाकीर्ण है, जीर्ण-शीर्ण पद-त्राण-

चढ़ा शिखर पर कल कलश, लेकिन आज मलीन।
चमक द्वेष-छल ने लिया, कुछ वर्षों में छीन।।

पनघट पर घटना घटी, मचा भयंकर शोर।
कलस लिए कटि कलसिरी, करे कलह पुरजोर।

नहीं जबरदस्ती सटो, मिले न रविकर चैन।
रहो दूर राजी-खुशी, पथ ताकेंगे नैन।।

हिंसक-पशु से भी बुरा, रविकर कपटी दोस्त।
करे बुद्धि को भ्रष्ट यह, पशु तो नोचे गोश्त।।

हो खुश्बू किरदार में, तब तो होगी नेह।
महकाया क्या इत्र से, रविकर तूने देह।

बगुला निगला गुलगुला, फाँका करता हंस।
कागा-कुल मोती चुगे, हँसे दुशासन-कंस।।

होंठ बड़े शातिर मिले, करे न कुछ परवाह।
चाहे जितना दिल दुखे, किन्तु न भरते आह।।

यह शक्कर की चाशनी, वह चीनी का पाक।
देह-देश के शत्रु दो, रविकर करो हलाक।।

मन की मनमानी खले, रखिये खीँच लगाम ।
हड़बड़ में गड़बड़ करे, पड़ें चुकाने दाम ।।

चुनौतियां देती बना, ज्यादा जिम्मेदार।
जीवन बिन जद्दोजहद, बिना छपा अखबार।।

जब माँ पर करती कटक, वर्तमान बलिदान।
तब भविष्य होता सुखी, होता राष्ट्रोत्थान।।

सदा आत्मघाती हुआ, नैतिकता का पाठ।
शत्रु पढ़ाये सर्वदा, सोलह दूनी आठ।।

करे प्रशंसा मूर्ख जब, खूब बघारे शान।
सुनकर निंदा हो दुखी, तथाकथित विद्वान।।

रविकर तन को दे जला, करे सुमति को भ्रष्ट।
क्रोध-अग्नि को मत दबा, दे बहुतेरे कष्ट।।

बना क्रोध भी पुण्य जब, झपटा गिद्ध जटायु।
मौन साधना, भीष्म का, कौरव की अल्पायु।।

पद पाकर पगला गए, रविकर कई पदस्थ।
पद-प्रहार औषधि सही, उन्हें रखे जो स्वस्थ।।

नित्य वेदना बढ़ रही, करे सटीक उपाय।
पढ़े वेद नाना सतत, होते राम सहाय।।।

खाली घर शैतान का, बैठे-ठाले सोच।
करूँ खाट किसकी खड़ी,लूँ किसका मुँह नोच।।

पढ़ें वेद नाना सतत, सिद्ध करें वे स्वार्थ ।
रविकर पढ़कर वेदना, करे प्राप्त परमार्थ।।

बाँध बहे, बादल फ़टे,चक्रवात तूफान।
धनी पकौड़े खा रहे, खाये जहर किसान।।

ऐसा वन देखा कहाँ, ऐ सावन के सूर।
जहाँ हरेरी की जगह, भगवा हो भरपूर।।

मार्ग कंटकाकीर्ण है, जीर्ण-शीर्ण पद-त्राण।
मिले परम्-पद किस तरह, देते भक्त प्रमाण।।

हुआ इश्क नाकाम तो, कर ले मौज तमाम।
किन्तु मुकम्मल यदि हुआ, रहें चुकाते दाम।।

इश्क मुकम्मल यदि हुआ, हो शर्तिया विवाह।
हुआ इश्क नाकाम तो, अब तक है उत्साह।।




08 July, 2019

कुछ व्यंजनों के प्राण निकलें, सुन स्वरों की व्यंजना-

बाधाओं से क्यों डरे, रे जिंदा इन्सान।
अर्थी के पथपर कभी, आते क्या व्यवधान ??

जब चोट जिभ्या पर लगे, उपचार क्या करना अहो।
वह खुद-ब-खुद ही ठीक होगी, बस जरा पीड़ा सहो।
यदि चोट जिभ्या से लगे, उपचार ही कोई नहीं-
बस पीर प्राणान्तक सहो, सहते रहो कुछ मत कहो।।

😊😊
बी पी अनिद्रा चिड़चिड़ापन, और बेचैनी अगर।
दो बार सिर से हाँ करो, अर्धांगिनी की बात पर।
दायें नहीं बाएं नहीं मुंडी हिलाना तुम कभी-
सबसे बड़ा योगा यही, घर मे नियम से रोज कर।।
😊😊
कांता रखे आराम से सिर वक्ष पर एकांत में।
मेरे सिवा वह कौन नारी रुचि रखे जो आपमें।
बेशक प्रत्युत्तर है सही कोई नही कोई नही-
पर कर न दे चुगली मियाँ, दिल की बढ़ी धड़कन कहीं।

मुस्कुराहट में छुपे हर दर्द को पहचानता।
रोष के पीछे छुपे उस प्यार को भी जानता।
मौन का कारण पता है, किन्तु कैसे बोल दूँ।
आ रही आड़े हमारे बीच की असमानता।।

जरूरत कभी भी न पूरी हुई, सदा नींद भी तो अधूरी हुई।
अरी मौत तेरा करूँ शुक्रिया, जरूरत खतम नींद पूरी हुई।।

सुगर अवसाद प्रेसर का, बता अंजाम क्या होगा।
लगाई पंक्ति प्रातः ही, मगर डॉक्टर करे योगा-
दवा की लिस्ट लम्बी सी, दिया फिर चार सौ लेकर-
बदल ली किन्तु दिनचर्या, तिलांजलि लिस्ट को देकर।।

नशे में बुद्धिजीवी सब, दलाली मीडिया करता।
मदान्धी हो रही सत्ता, कुकर्मी कब कहाँ डरता।
तमाशा देखती जनता, नपुंसक हो चुकी अब तो-
अगर है जागरुक कोई, वहाँ भी आह वह भरता।।

कुछ व्यंजनों के प्राण निकलें, सुन स्वरों की व्यंजना।
अभिव्यंजना की हर समय, मात्रा करे आलोचना।
मात्रा लवण की यदि उचित तो स्वाद व्यंजन का बढ़े-
रख वाक्य में मात्रा उचित, कवि मन्त्र देते है बना।।

19 June, 2019

लगता क्या कुरुक्षेत्र, हमारे अब्बू का घर-

घर मेरे माँ-बाप का, बेगम करे बखान।
झगड़ा मत करना यहाँ, रखना सबका मान।
रखना सबका मान, मियाँ का चढ़ता पारा।

बात तुम्हारी ठीक, बोलकर ताना मारा।

क्यों देती हो छेड़, वहाँ पर झगड़ा अक्सर।

लगता क्या कुरुक्षेत्र, हमारे अब्बू का घर।।
(2)

😊😊😊😊😊😊😊😊😊नहला
मेरे पिताजी का भवन, घुसते हुए पत्नी चे'ताई।
अब ठीक रखना मूड अपना, मत यहाँ करना लड़ाई।

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊दहला
लगता तुम्हे कुरुक्षेत्र क्या, #मेरे #पिता #का #घर कहो।
गाहे-बगाहे छेड़ देती जो महाभारत अहो।।

(3)

😊😊
ज्यों होश में आई प्रसूता, खूब उत्सुकता दिखाई।
कुछ खोजते जब नर्स देखी, पालने से शिशु उठाई।।
मैं शिशु नहीं निज फोन खोजूं, प्लीज जल्दी दीजिये।
#स्टेटस लगाना #फेसबुक पर, और लेनी है बधाई।।

😊😊😊

प्राप्त की दो भ्रूण-हत्या कर मनौती पर जिसे।
भेज वृद्धाश्रम गया था, कल वही बालक उसे।
जाते हुवे उस पुत्र को वह रोकती आवाज दे-
बोझ मत रखना हृदय पर, बोली हकीकत पुत्र से।।

सुगर अवसाद प्रेसर का, बता अंजाम क्या होगा।
लगाई पंक्ति प्रातः ही, मगर डॉक्टर करे योगा-
दवा की लिस्ट लम्बी सी, दिया फिर चार सौ लेकर-
बदल ली किन्तु दिनचर्या, तिलांजलि लिस्ट को देकर।।


कुछ व्यंजनों के प्राण निकलें, सुन स्वरों की व्यंजना।
अभिव्यंजना की हर समय, मात्रा करे आलोचना।
मात्रा लवण की यदि उचित तो स्वाद व्यंजन का बढ़े-
रख वाक्य में मात्रा उचित, कवि मन्त्र देते है बना।।


नशे में बुद्धिजीवी सब, दलाली मीडिया करता।
मदान्धी हो रही सत्ता, कुकर्मी कब कहाँ डरता।
तमाशा देखती जनता, नपुंसक हो चुकी अब तो-
अगर है जागरुक कोई, वहाँ भी आह वह भरता।।


चुनावों में गुनाहों की नहीं चिंता करे कोई।
बयानों की झड़ी लगती, न ई. सी. से डरे कोई।
कहीं विस्फ़ोट बमबाजी कहीं पत्थर चलाते हैं-
करे कोई भरे कोई, जिये कोई मरे कोई।।


कहती गर्मी ऊन की, मैं तो सबसे गर्म।
सुनकर उबले खून तो, कहे सूत बेशर्म।
कहे सूत बेशर्म, देख लो सड़कें सूनी।
मैं हूँ सबसे गर्म, बोलता एक जुनूनी।
लेकिन आया जून, गर्म लू बहती रहती।
त्राहिमाम् का शोर, बचा लो दुनिया कहती।।


सेल्सगर्ल की कामना, बिक जाएँ कुछ कार।
वरना देगी फर्म यह, मेरे वस्त्र उतार। (मुहावरा)
मेरे वस्त्र उतार, कहे इक कॉलगर्ल तब।
बिके अन्यथा कार, दूसरा मार्ग नहीं अब।
अजब-गजब हालात, कामना कॉल गर्ल की।
कह रविकर वह फिक्र, बने अब सेल्सगर्ल की ।


हँसकर वह मैके गई, परेशान श्रीमान।
रखी कहाँ कंडोम तुम, पूछा उसी विहान।
पूछा उसी विहान, फोन पत्नी को करके।
मिले नहीं कंडोम, पास में मेरे घर के।
इसीलिए मैं साथ, बैग में लाई रखकर।
पटक रहा पति माथ, कही जब पत्नी हँसकर। ।।


आया मेरा फोन यदि, राज न देना खोल।
मेरे पति घर पर नहीं, झट से देना बोल।
झट से देना बोल, फोन आया ज्यों रविकर।
घर पर हैं पतिदेव, दिया पत्नी ने उत्तर।
पति करता जब क्रोध, उसे उसने समझाया।।
नहीं तुम्हारा फोन, फोन तो मेरा आया ।।

मुस्कुराहट में छुपे हर दर्द को पहचानता।
रोष के पीछे छुपे उस प्यार को भी जानता।
मौन का कारण पता है, किन्तु कैसे बोल दूँ।
आ रही आड़े हमारे बीच की असमानता।।

जरूरत कभी भी न पूरी हुई, सदा नींद भी तो अधूरी हुई।
अरी मौत तेरा करूँ शुक्रिया, जरूरत खतम नींद पूरी हुई।।

06 February, 2019

आई आई टी धनबाद

"-- " आई आई टी धनबाद के ब्वायज-हॉस्टल ||
रूबी और रोजलिन गर्ल्स हॉस्टल
रविकर दुनिया तो सदा, कहे ओल्ड इज गोल्ड।
डायमंड कहला रहा, किन्तु यहाँ का ओल्ड।।
(1)
दिखे जब फोर-फादर को, नजारे क्लोज कैम्पस में।
करें दिल खोलकर चर्चा, मगर फिर भी कशमकश में।।
बने फुटपाथ अब लम्बे, मगर पग फूँक कर धरना-
चतुर्दिश प्रेम पसरा है, पुराने तोड़ दो चश्में।।
शटल बस एक जोड़ी बस, सुबह से शाम तक चलती।
चढ़ी जो जोड़ियाँ बस में, नहीं रहती कभी बस में।।
चपल मन आलसी तन को, पढ़ाई के लिए ठेले।
दिखें जब दर्जनों ठेले, रहे तब चाट फोकस में।।
बनी बहुमंजिला बिल्डिंग, लगी हैं लिफ्ट भी उनमें-
निपटती लिफ्ट में रविकर, मुहब्बत की कई रस्में।।
बड़ी मजबूत छत इनकी, नहीं महफूज है लेकिन-
अकेले मत गिनो तारे, भरो रस-रंग आपस में।
कई तो हेल्थ सेंटर में कहानी जन्म लेती है।
मुहब्बत की दवा होती, जहाँ पैबस्त नस नस में।।
लगे है क्लोज सर्किट कैमरे, हर क्लास में फिर भी-
मुहब्बत के कई लेशन, किये शामिल सिलेबस में।।
(2)
"अम्बर" तलक फैली हुई, चमकार रूबी की चपल |
लगती भले को तो भली, खल को रही है किन्तु खल ||
*जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।।*
जिस "जैस्पर" की भैंस पानी में गयी, वो दर्द में-
नित शोध करता कि बड़ी है, भैंस या मेरी अकल।।
आँखे लड़ाना मत कभी, चमकार से उसकी मियाँ-
"टोपाज" तू तो बाज आ, कर बैठकर-न्यूमेरिकल ||
JRF
"एमरॉल्ड" तू मत कर नकल, उन इश्क़जादों की अभी-
चश्मा लगा चोथा बना, इक्जाम में फिर कर नकल ||
कैंटीन रोजादार के इफ्तार से रौशन मगर
वे याद कर "ओ पल" यहाँ, गम खा रहे हैं आजकल ||
opal
फायर "सफायर" में बड़ी है, किन्तु मिस-फायर सभी-
दो मास ही बाकी बचे, वे कम्पनी लेंगे बदल ||
final year

02 December, 2018

तुम तो मेरी शक्ति प्रिय-

जब से झोंकी आँख में, रविकर तुमने धूल।
अच्छे तुम लगने लगे, हर इक अदा कुबूल।।

भाषा वाणी व्याकरण, कलमदान बेचैन।
दिल से दिल की कह रहे, जब से प्यासे नैन।।

जिसपर अंधों सा किया, लगातार विश्वास।
अंधा साबित कर गया, रविकर वह सायास।।

नहीं हड्डियां जीभ में, पर ताकत भरपूर |
तुड़वा सकती हड्डियां, देखो कभी जरूर ||

तुम तो मेरी शक्ति प्रिय, सुनती नारि दबंग।
कमजोरी है कौन फिर, कहकर छेड़ी जंग।।

पत्नी पूछे हो कहाँ, कहे पड़ोसन पास।
वो फिर बोली 'किस'-लिए, पति बोला यस-बॉस।।

मार्ग बदलने के लिए, यदि लड़की मजबूर |
कुत्ता हो या आदमी, मारो उसे जरूर ||

देह जलेगी शर्तिया, लेकर आधा पेड़।
एक पेड़ तो दे लगा, दे आंदोलन छेड़।।

वृक्ष काट कागज बना, लिखते वे सँदेश |
"वृक्ष बचाओ" वृक्ष बिन, बिगड़ेगा परिवेश ||

मिला कदम से हर कदम, चलते मित्र अनेक।
कीचड़ किन्तु उछालते, चप्पल सम दो-एक।।

सम्बन्धों के मध्य में, आवश्यक विश्वास।😊
करो सुनिश्चित वो कहीं, जाय न पत्नी पास।।

पैर न ढो सकते बदन, किन्तु न कर अफसोस।
पैदल तो जाना नही, तत्पर पास-पड़ोस ।।

अरे भगोने चेत जा, ये चमचे मत पाल |
झोल छोड़कर वे सभी, लेंगे माल निकाल ||

कंगारू सी मैं बनूँ, दे दो प्रभु वरदान।
ताकि फोन हो हाथ मे, थैली में सन्तान।।

बेमौसम ओले पड़े, चक्रवात तूफान।
धनी पकौड़ै खा रहे, खाये जहर किसान।।

चाय नही पानी नही, पीता अफसर आज।
किन्तु चाय-पानी बिना, करे न कोई काज।।

दिनभर पत्थर तोड़ के, करे नशा मजदूर।
रविकर कुर्सी तोड़ता, दिखा नशे में चूर।।

चुरा सका कब नर हुनर, शहद चुराया ढेर।
मधुमक्खी निश्चिंत है, छत्ता नया उकेर।।

आँधी पानी बर्फ से, बचा रही जो टीन।
ताना सुनती शोर का, ज्यों गार्जियन-नवीन।।

जिस सुर में माँ-बाप को, देते तुम आवाज।
पुत्र उसी सुर का करे, रविकर नित्य रियाज।।

श्याम सलोने सा रहा, सुंदर रविकर बाल ।
भैरव बाबा दे बना, सांसारिक जंजाल।।

सोना सीमा से अधिक, दुखदाई है मित्र।
चोर हरे चिन्ता बढ़े, बिगड़े स्वास्थ्य चरित्र।

टूटे यदि विश्वास तो, काम न आये तर्क।
विष खाओ चाहे कसम, पड़े न रविकर फर्क।।

होती पाँचो उँगलियाँ, कभी न एक समान।
मिलकर खाती हैं मगर, रिश्वत-धन पकवान ।।

बड़ा नही धन से बने, मन्सूबे मत पाल।
तेल मसाला ले नमक, दही उड़द की दाल।|

पहली कक्षा से सुना, बैठो तुम चुपचाप।
यही आज भी सुन रहा, शादी है या शाप।।

रहा तरस छह साल से, लगे निराशा हाथ |
दिखी आज आशा मगर, दो बच्चों के साथ ||

जाग चुका अब हर युवा, करे पतंजलि पेस्ट।
बिना डेढ़ जीबी पिये, कभी न लेता रेस्ट।।

दल के दलदल में फँसी, मुफ्तखोर जब भेड़ ।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उसका ऊन उधेड़ ।।

गली गली गाओ नहीं, दिल का दर्द हुजूर।
घर घर मरहम तो नही, मिलता नमक जरूर।।

चंद चुनिंदा मित्र रख, जिंदा रख हर शौक।
ठहरेगी बढ़ती उमर, करे जिक्र हर चौक।|

शीलहरण पे पढ़ रही, भीड़ व्याह के मन्त्र |
सहनशील-निरपेक्ष मन, जय जय जय जनतंत्र ||

अधिक आत्मविश्वास में, इस धरती के मूढ़ |
विज्ञ दिखे शंकाग्रसित, यही समस्या गूढ़ ||

सुबह-शाम सुलगा रहे, धूप-अगर-लुहबान |
मच्छर क्यों भागे नहीं, क्यों न दिखे भगवान् ||

धर्म-कर्म पर जब चढ़े, अर्थ-काम का जिन्न |
मंदिर मस्जिद में खुलें, नए प्रकल्प विभिन्न ||

धनी पकड़ ले बिस्तरा, भाग्य-विधाता क्रूर ।
ले वकील आये सगे, रखा चिकित्सक दूर।।

घूम घूम कर बेचता, ग्वाला दूध उधार।
ढूंढ ढूंढ मदिरा नगद, किनता किन्तु बिहार।।

चले शूल पर तो चुभा, जूते में बस एक।
पर उसूल पर जब चले, चुभते शूल अनेक।।

नोटों की गड्डी खरी, ले खरीद हर माल।
किन्तु भाग्य परखा गया, सिक्का एक उछाल।।

रविकर रोने के लिए, मिले न कंधा एक।
चार चार कंधे मिले, बिलखें आज अनेक।।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

पूरे होंगे किस तरह, कहो अधूरे ख्वाब।
सो जा चादर तान के, देता चतुर जवाब।।

रविकर अच्छे कर्म कर, फल की फिक्र बिसार।
आम संतरा सेब से, पटे पड़े बाजार।।

खले मुखर की वाह तब, समझदार जब मौन।
काव्य शक्ति-सम्पन्न तो, कवि को भूले कौन।।

दर्पण जैसे दोस्त की, यदि पॉलिस बदरंग।
रविकर छोड़े शर्तिया, प्रतिछाया भी संग।

लेडी-डाक्टर खोजता, पत्नी प्रसव समीप।
बुझा बहन का जो चुका, रविकर शिक्षा-दीप।।

अपनी गलती पर बने, रविकर अगर वकील।
जज बन के खारिज़ करे, पत्नी सभी दलील।।

किया बुढ़ापे के लिए, जो लाठी तैयार।
मौका पाते ही गयी, वो तो सागर पार।

फूँक मारके दर्द का, मैया करे इलाज।
वह तो बच्चों के लिए, वैद्यों की सरताज।

चक्षु-तराजू तौल के, भार बिना पासंग।
हल्कापन इन्सान का, देख देख हो दंग।।

चुरा सका कब नर हुनर, शहद चुराया ढेर।
मधुमक्खी निश्चिंत है, छत्ता नया उकेर।।

हर मकान में बस रहे, अब तो घर दो चार।
पके कान दीवार के, सुन सुन के तकरार।।

मेरे मोटे पेट से, रविकर-मद टकराय।
कैसे मिलता मैं गले, लौटा पीठ दिखाय।।

रिश्ते 'की मत' फ़िक्र कर, यदि कीमत मिल जाय।
पहली फुरसत में उसे, देना तुम निपटाय।।

नौ सौ चूहे खाय के, बिल्ली हज को जाय।
चौराहे पर बैठ के, गिनती बूढ़ी गाय।।

कुल के मंगलकार्य में, करे जाय तकरार।
हर्जा-खर्चा ले बचा, चालू पट्टीदार ।।

अपने मुंह मिट्ठू बनें, किन्तु चूकता ढीठ।
नहीं ठोक पाया कभी, रविकर अपनी पीठ।।

अजगर सो के साथ में, रोज नापता देह।
कर के कल उदरस्थ वह, सिद्ध करेगा नेह।।

खड्ग तीर चाकू चले, बरछी चले कटार।
कौन घाव गहरा करे, देखो ताना मार ।।

नोटों की गड्डी खरी, ले खरीद हर माल।
किन्तु भाग्य परखा गया, सिक्का एक उछाल।।

मजे मजे मजमा जमा, दफना दिया जमीर |
स्वार्थ-सिद्ध सबके हुवे, लटका दी तस्वीर ||

झूठे दो-दो चोंच कर, लड़ें चोंचलेबाज |
एक साथ फिर बैठते, करे परस्पर खाज ||

अगर वेद ना पढ़ सके, कर ले 'रविकर' जाप । 
व्यक्ति-वेदना पढ़ मगर,  हर उसका संताप ।।

बेलन ताने नारि तो, चादर तानें लोग |
ताने मारे किन्तु जब, टले  कहाँ दुर्योग ||

जाति ना पूछो साधु की, कहते राजा रंक |
मजहब भी पूछो नहीं, बढ़ने दो आतंक ||  

मयखाने में शाम को, जो कुछ आया भूल।
सुबह-सुबह पहुँचा गया, रविकर नामाकूल।।😊

घड़ियों के रिश्ते-सुई, रहें परस्पर मग्न।
घड़ी घड़ी मिलते नहीं, किन्तु सदा संलग्न।।

टेढ़ा पति सीधा हुआ, टेढ़ी रोटी गोल।।
गोल-गोल इस यंत्र का, नाम न रविकर खोल।।

रविकर जीवन-पुस्तिका, पलटे पृष्ट हजार।
वैसे के वैसे मिले, शब्द-अर्थ हर बार।।

खुद से नाड़ा बाँध ले, वो ही बाल सयान।
ढीला होने दे नहीं, वही तरुण बलवान।।

आत्म-मुग्ध विद्वान का, उस विमूढ सा हाल।
बैठ गधे पर जो चले, सिर पर उठा बवाल।।

जब #दारू हर सोच को, करे प्रकट बिंदास।

तब अपनी #दारा करे, बन्द सकल बकवास।।