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25 August, 2016

कृष्ण

हरिगीतिका
जय देवकी जसुमति जयतु जय राधिके जय रुक्मनी।
जय गोपियाँ जय द्रोपदी जय जय सुभद्रे सद्गुनी।
पटरानियाँ कुल रानियाँ कुंती बुआ जय जय जयतु |
कृष्णा जयतु दाऊ जयतु जय नन्द वसुदेवा जयतु ||

सम्पूर्ण गीता सार (१९-दोहे)
अर्जुन उवाच-
भिक्षाटन करके जिऊँ, नहीं करूँ मैं युद्ध |
सरक रहा गांडीव मम, गुरुजन-स्वजन विरुद्ध ||1||
कृष्ण उवाच-
अजर-अमर आत्मा सदा, भक्ति-ज्ञान निष्काम |
करे कर्म निष्काम तो, पाए भगवद्धाम ||2||
चाहो सुख स्वाधीनता, निर्भरता अमरत्व |
जग से नाता तोड़ के, दे जग को हर तत्व ||3||
भोग लोक-परलोक में, किये हुवे निज कर्म |
कर्म करो संसार हित, नित्य-योग तव-मर्म ||4||
अर्जुन कर्म-सकाम को, बन्धन समझ परोक्ष |
ईश्वर सह संयोग से, कर्म दिलाये मोक्ष ||5||
प्रभु चरणों में हो सके, कभी नहीं लवलीन |
काम-क्रोध-मद-लोभ ले, ध्यानावस्था छीन ||6||
कोई दूजा है नहीं, एकमात्र भगवान् |
ऐसा जो अनुभव करे, पाए सम्यक ज्ञान ||7||
प्रभु-प्रति किंचित-प्रेम भी, कर दे बेड़ा पार |
हो निर्मल आनंद का, मन में यदि संचार ||8||
वशीभूत करके प्रकृति, रचूँ सतत यह सृष्टि |
परमात्मा निश्चय दिखें, भक्तिमयी यदि दृष्टि ||9||
प्रभु-प्रभाव जाने नहीं, बिना कृपा ऋषि देव |
करूँ कृपा जब भक्त पर, पाए ज्ञान स्वमेव ||10||
करता अर्जुन प्रार्थना, पाता चिन्मय दृष्टि |
विश्वरूप दर्शन करे, हुई कृपा की वृष्टि ||11||
सुमिरन कीर्तन वन्दना, श्रवण अर्चना दास्य |
पदसेवन नौ-साधना, आत्म-निवेदन सांख्य ||12||
होय भक्ति से भक्ति फिर, पैदा बारम्बार |
प्रेमलक्षणा भक्ति है, साध्य-भक्ति का सार ||13||
कर्म करे जैसे मनुज, वैसे फल का योग |
बार बार रे जीव तू, जन्म-मरण फल भोग ||14||
त्रिगुण सत्व रज तम सदा, रहे एक ही संग |
सत्वगुणी होता मनुज, ज्ञानमयी जब अंग ||15||
सबको भगवत-प्राप्ति का, है समान अधिकार |
हरदम सबके पास मैं, देखो हृदय-विदार ||16||
शास्त्रों के आधार पर, जीवन करो समृद्ध |
धारो कुल दैवीय गुण, लो आध्यात्मिक सिद्ध ||17||
जनमे निकृष्ट-योनि में, यदि निंदित आचार |
किन्तु होय रमणीय तो, हो भवसागर पार ||18||
शरणागत प्रभु के हुवे, तब चिंता क्यूँ तोय |
अब भी यदि चिंता करो, जान सके ना मोय ||19||


कुंडलियां 
१)
 कृष्णा करदे कृपा कुछ, कामयाब हो भक्ति।
बढे नित्य दासत्व मम, बढ़े चरण आसक्ति।
बढ़े चरण आसक्ति, पहर दर पहर निहारूँ।
सुध-बुध जाये खोय, आप पे तन मन वारूँ।
दासी रही पुकार, मिटा दे मन की तृष्णा।
दिखा मोहिनी रूप, आज ही मेरे कृष्णा।
२)
अर्जुन क्यों प्यारा लगे, उस पर कृपा अपार।
नारि वेश उसने धरा, इसीलिए क्या प्यार।
इसीलिए क्या प्यार, नारि मैं भी हूँ स्वामी।
करिये मम उद्धार, आप तो अन्तर्यामी।
माना मैं पापिष्ट, व्याप्त तन मन में अवगुन।
अपनी दासी मान, तार ज्यों तारा अर्जुन।।
३)
गिरधर धर धर डपटते, पर पटते झट आप।
मेरे हृदय विराजिये, हरिये मम संताप।
हरिये मम संताप, हरे ज्यों द्रुपदसुता के।
दिखला रूप विराट, विदुर घर खाना खा के ।
जरासंध संहार, कंस का आओ बध कर। 
जी भर के फटकार, सँभालो लेकिन गिरधर।।
 सवैया 
1)
धूल उठाय लगाय रहे, कुछ खाय रहे बिथराय रहे।
मातु उठाय हटाय रही मुख खोलत ही भरमाय रहे।
मोह करे जब अस्त्र धरे, तब अर्जुन को समझाय रहे।
विश्व विराट स्वरूप दिखा, ममता मद मोह मिटाय रहे।।
2)
चीर चुराय चढ़े तरु पे यमुना तट पे जब ग्वालिन न्हावै।
चीर रहे जब भीम शरीर खड़े तरकीब करीब बतावैं।
चक्र चलाय हुवे जखमी द्रुपदी ढिग चीर शरीर बंधावैं।
चीर हरे दरबार भरे तब मोहन चीर अपार बढ़ावै।