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12 October, 2011

रही व्यक्तिगत सोच, चला कश्मीर छेंकने |

लगा रेकने जब कभी, गधा बेसुरा राग |
बहुतों ने बम-बम करी, बैसाखी में फाग |

बैसाखी में फाग, घास समझा सब खाया |
गलत सोच से खूब, सकल परिवार मुटाया |

रही व्यक्तिगत सोच, चला कश्मीर छेंकने |
ढेंचू - ढेंचू  रोज, लगा  बे-वक्त  रेंकने || 

7 comments:

  1. क्या बात है रविकर जी, बहुत सुन्दर...

    हँसते हँसते कह गये, तीखी तीखी बात
    सूरज आते तप उठे, जैसे शीतल प्रात.

    सादर...

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  2. वाह वाह ..बहुत खूब...कह गए हास्य ब्यंग के सहारे बहुत गहरी बात ....

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  3. बेहद खुबसूरत ब्यंग ,बधाई..

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