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29 November, 2011

भगवती शांता परम सर्ग-5

भाग-4 
शांता का सन्देश 

सृन्गेश्वर से आय के, हुई जरा चैतन्य |
छोड़ विषय को सोचने, लगी शांता अन्य |

सृंगी के इक शोध से, उसको आया ख्याल ||
बिना पुत्र के जो बुरा, अवध राज का हाल ||

गुरु वशिष्ठ को भेजती, अपना इक सन्देश |
तीव्रगति से पहुँचता, शांता  दूत  विशेष ||

रिस्य सृंग के शोध का, था  उसमें उल्लेख | 
गुरु वशिष्ठ हर्षित हुए, विषयवस्तु को देख ||

चितित दशरथ को बुला, बोले गुरू वशिष्ठ ||
हर्षित दशरथ कर रहे, कार्य सभी निर्दिष्ट ||

तैयारी पूरी हुई, रथ को रहे उडाय |
रिस्य सृंग के सामने, झोली को फैलाय ||

हमको ऋषिवर दीजिये, अब अपना आशीष |
चरणों में हैं लोटते, पटके अपना शीश ||

राजन धीरज धारिये, काहे होत अधीर |
सृन्गेश्वर को पूजिये, वही हरेंगे पीर ||

मैं तो साधक मात्र हूँ, शंकर ही हैं सिद्ध |
दोनों हाथों से पकड़, बोले उठिए वृद्ध ||

सात दिनों तक आपकी, करूँगा पूरी जाँच |
सृन्गेश्वर के सामने, शिव पुराण नित बाँच ||

सात दिनों का तप प्रबल, औषधिमय खाद्यान |
दशरथ पाते पुष्टता, मिटे सभी व्यवधान ||

सूची इक लम्बी लिखी,  सृंगी देते सौंप ||
बुड्ढी काया में दिखी, तरुणों जैसी चौप ||

कुछ प्रायोगिक कार्य हैं, कोसी की भी बाढ़ |
इंतजाम करके रखो,  आऊं माह असाढ़||

ख़ुशी-ख़ुशी दशरथ गए, रौनक रही बताय | 
देरी के कारण उधर, रानी सब उकताय ||

अवधपुरी के पूर्व में, आठ कोस पर एक |
बहुत बड़े भू-खंड पर, लागे लोग अनेक ||

सुन्दर मठ-मंदिर बना, पोखर बना विशेष |
हवन कुंड भी सज रहा, पहुंचा सारा देश ||

थी अषाढ़ की पूर्णिमा, पुत्र-काम का यग्य |
सुमिर गजानन को करें, रिस्य सृंग से विज्ञ ||

शांता भी आई वहां, रही व्यवस्था देख |
फुर्सत में थी बाँचती, सृंगी के अभिलेख ||

 समझे न जब भाष्य को, बिषय तनिक गंभीर |
फुर्सत मिलते ही मिलें, सृंगी सरयू तीर ||

देखें जब अभ्यासरत, रिस्य रिसर्चर रोज |
नए-नए सिद्धांत को, प्रेषित करते खोज ||


प्रेम प्रस्फुटित कब हुआ, जाने न रिस्य सृंग |
वहीँ किनारे भटकता, प्रेम-पुष्प पर भृंग ||

कई दिनों तक यग्य में, रहे व्यस्त सब लोग |
नए चन्द्र दर्शन हुए, आया फिर संयोग ||

पूर्णाहुति के बाद में, अग्नि देवता आय |
दशरथ के शुभ हाथ में, रहे खीर पकडाय ||

दशरथ ग्रहण कर रहे, कहें बहुत आभार |
आसमान में देवता, करते जय जयकार ||

कौशल्या करती ग्रहण, आधी पावन खीर |
कैकेयी भी ले रही, होकर बड़ी अधीर ||

दोनों रानी ने दिया, आधा आधा भाग |
रहा सुमित्रा से उन्हें, अमिय प्रेम अनुराग ||

चैत्र शुक्ल नवमी तिथी, प्रगट हुवे श्री राम |
रही दुपहरी खुब भली, तनिक शीत का घाम ||

गोत्र दोष को काटते, रिस्य सृंग के मन्त्र |
कौशल्या सुदृढ़ करे, अपना रक्षा तंत्र ||

कैकेयी के भरत भे, हुई मंथरा मग्न |
हुवे सुमित्रा के युगल,लखन और शत्रुघ्न ||

अंग अंग लेकर विकल, गई शांता अंग |
और इधर रिस्य सृंग की, शोध हो रही भंग ||

7 comments:

  1. अच्छी प्रस्तुति

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  2. शांता का सन्देश पढ़ कर अच्छा लगा !
    बेहतरीन रचना !

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  3. आज मचाई मंच पर, कुछ चर्चा की धूम।
    अपने चिट्ठे के लिए, उपवन में लो घूम।।

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति...

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