Follow by Email

19 November, 2011

भगवती शांता परम (मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सहोदरी)

(सर्ग -१ की पूरी कथा का सूत्र )

भगवती शांता परम (मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सहोदरी बहन )

 (सर्ग-२ भाग-१ की कथा का सूत्र)

भगवती शांता परम

सर्ग-२
भाग-2
          रावण का गुप्तचर           
दोहे
असफल खर की चेष्टा, होकर के गमगीन |
लंका जाकर के कहे,  चेहरा लिए मलीन ||

रावण शाबस बोलता, काहे  होत उदास |
कौशल्या के गर्भ का, करके पूर्ण विनाश ||
File:Demon Yakshagana.jpg
खर बोला भ्राता ज़रा, खबर कहो समझाय |
यह घटना कैसे  हुई, जियरा तनिक जुड़ाय ||

रानी रथ से कूद के, खाय चोट भरपूर |
तीन माह का भ्रूण भी, हुआ स्वयं से चूर ||

खर के संग फिर गुप्तचर, भेजा सागर पार |
वह सुग्गासुर जा जमा, शुक थे जहाँ अपार ||
हरकारे वापस इधर, आये दशरथ पास |
घटना सुनकर हो गया, सारा अवध उदास ||

गुरुकुल में शावक मरा, हिरनी आई याद |
अनजाने घायल हुई, चखा दर्द का स्वाद ||

गुरु वशिष्ठ की अनुमती, तुरत चले ससुरार |
कौशल्या को देखते, नैना छलके प्यार ||

संक्रान्ति से सूर्य ने, दिए किरण उपहार |
अति-ठिठुरन थमने लगी, चमक उठा संसार ||

दवा-दुआ से हो गई, रानी जल्दी ठीक |
दशरथ के सत्संग से, घटना भूल अनीक ||

विदा मांग कर आ गए, राजा-रानी साथ |
चिंतित परजा झूमती, होकर पुन: सनाथ ||
http://www.shreesanwaliyaji.com/blog/wp-content/uploads/2011/02/vasant-panchami-saraswat-sanwaliyaji_bhadsoda.jpg
धीरे धीरे सरकती, छोटी होती रात |
 हवा बसंती बह रही, जल्दी होय प्रभात |

पीली सरसों फूलती, हरे खेत के बीच |
 कृषक निराई कर रहे, रहे खेत कुछ सींच ||
तरह तरह की जिंदगी, पक्षी कीट पतंग |
पशू प्रफुल्लित घूमते, नए सीखते ढंग ||

कौशल्या रहती मगन, वन-उपवन में घूम ||
धीरे धीरे भूलती, गम पुष्पों को चूम ||


कौशल्या के गर्भ की, कैसे रक्षा होय |
दशरथ चिंता में पड़े, आँखे रहे भिगोय ||

गिद्धराज की तब उन्हें, आई बरबस याद |
तोते कौवे की बढ़ी, महल पास तादाद ||

कौशल्या जब देखती, गिद्धराज सा गिद्ध |
याद जटायू को करे, कार्य करे जो सिद्ध ||

यह मोटा भद्दा दिखे, आत्मीय वह रूप |
यह घृणित हरदम लगे, उसपर स्नेह अनूप ||

गिद्ध दृष्टि रखने लगा, बदला बदला रूप |
अलंकार त्यागा सभी, बनकर रहे  कुरूप ||


केवल दशरथ जानते, होकर रहें सचेत |
अहित-चेष्टा में लगे, खर-दूषण से प्रेत ||


सुग्गासुर अक्सर उड़े, कनक महल की ओर |
देख जटायू को हटे, हारे मन का चोर ||


एक दिवस रानी गई, वन रसाल उल्लास |
सुग्गासुर आया निकट, बाणी मधुर सुभाष || 


माथे टीका शोभता, लेता शुक मनमोह |
ऊपर से अतिशय भला, मन में राखे द्रोह ||

 

रानी वापस आ गई, आई फिर नवरात |
नव-दुर्गा को पूजती, एक समय फल खात ||


स्नानकुंज में रोज ही, प्रात: करे नहान |
भक्तिभाव से मांगती, माता सम सन्तान ||



सुग्गासुर की थी नजर, आ जाता था पास |
 स्वर्ण-हार हारक उड़ा, झटपट ले आकाश ||
gold necklace
  सुनकर चीख-पुकार को, वो ही भद्दा गिद्ध ||
शुक के पीछे लग गया, होकर अतिशय क्रुद्ध ||


जान बचाकर शुक भगा, था पक्का अय्यार ||
छुपा सुबाहु के यहाँ, पीछे छोड़ा हार ||


वापस पाकर हार को, होती हर्षित खूब |
राजा का उपहार वो, गई प्यार में डूब ||
Jawalamukhi Kanya Puja
 नवमी को व्रत पूर्ण कर, कन्या रही खिलाय  |
 चरण धोय कर पूजती, पूरी-खीर जिमाय ||


सूर्यदेव का ताप भी, दारुण होता जाय |
पाँव इधर भारी हुए, रानी फिर सकुचाय ||
 



4 comments:

  1. ये तो बढिया जानकारी दी आपने…………आभार्।

    ReplyDelete
  2. आदरणीय महाकवि रविकर जी,
    नमन....
    मेरा स्वार्थ मुझे विवश कर रहा है कि आपसे भविष्य के लिये एक समय निश्चित कर लूँ 'जिसमें आप मुझे किसी कथ्य को विविध छंदों में सहज रूप में ढालने की शिक्षा देंगे.'
    मेरा बहुत मन है कि आपसे साक्षात काव्य की विधिवत शिक्षा लूँ...

    लेकिन मन में छिपा शरारती आलोचक दबी आवाज में कह रहा है कि 'भगवती शांता परम' की कथावस्तु आधुनिक सोच में रची-बसी होनी चाहिए थी न कि ...."
    कुछ अधिक समय मिलते ही देश में प्रचलित समस्त राम कथाओं को 'भारत भारती वैभवं' पर देने का सोचा है... फिर 'राम' की उस कथा को कहूँगा जो सर्व-स्वीकृत हो जिसमें चर्चा का खुला आमंत्रण रहेगा. बस एक ऐसे मुहूर्त का इंतज़ार है जिसमें यदि कार्य को शुरू करूँ तो टिप्पणियों का साथ ही साथ उत्तर भी देने का धर्म निभाऊँ.

    ReplyDelete
  3. आदरणीय रविकर जी...
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति....
    सादर बधाई...

    ReplyDelete