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09 December, 2011

भगवती शांता परम सर्ग-7

भाग-2 
दो दिन का करके सफ़र, पहुंची कोसी तीर |
आश्रम में स्वागत हुआ, मिटी पंथ की पीर ||

अगला दिन अति व्यस्त था, अति-प्रात: उठ जाय |
आज्ञा लेकर सास की, नित्य कर्म निबटाय ||

कोशी की पूजा करे, कुलदेवी के बाद  |
सृन्गेश्वर को पूजती, मन में अति-अह्लाद ||

सास ससुर के चरण छू, बना रही पकवान |
आश्रम के सब जन बने, शांता के मेहमान ||

बड़ी रसोई में जले, चूल्हे पूरे सात |
दही बड़े जुरिया बनी,  उरद-दाल सह भात ||

आलू-गोभी की पकी, सब्जी भी रसदार |
मेवे वाली खीर से, छाई वहाँ बहार ||

दस पंगत लम्बी लगी, कुल्हड़ पत्तल साज |
भोजन लगी परोसने, अन्नपूर्णा आज ||

परम बटुक संग में लगा, रिस्य सृंग पद भूल |
अतिथि हमारे देवता, सबको किया क़ुबूल ||

परम बटुक से खुश सभी, शारद सदा सहाय |
एक बार के पाठ से, गूढ़ विषय आ जाय ||

पढ़े चिकित्सा शास्त्र वो, विषय बहुत ही गूढ़ ||
परंपरा के ज्ञान पर,  होकर के आरूढ़ ||

मन मानव कल्याण में, धन दौलत को भूल |
दीन-दुखी बीमार की, सेवा बने उसूल ||

नए शोध पर रख रहा, अपनी तीक्ष्ण निगाह |
कम कैसे हो सकेगी, अति-दर्दीली आह|

दीदी की ससुराल में, बनकर सच्चा भाय |
सेवा सुश्रुषा करे, गुरुकुल को महकाय ||

दूर-दूर से आ रहे,  याचक-दाता द्वार |
रोगी भी करवा रहे, आश्रम में उपचार ||

कुछ प्रतिनिधि विनती करें, कृपा कीजिये नाथ |
घाटी की बिगड़ी दशा, नहीं सूझता  पाथ ||
 
देव हिमाचल भूमि में, बिगढ़ रहे हालात  |
वर्षा ऋतु आधी गई, हुई नहीं बरसात ||

खाने के लाले पड़े, नंगे होंय पहाड़ |
हिंसक जीवों की वहाँ, गूंजे लगी दहाड़ ||

देव मनुज गन्धर्व सब, ऋषिवर परजा तोर |
घाटी की विपदा हरो, जन जन रहा अगोर ||

 ऋषी बिबंडक ने कहा, रखिये मन में धीर |
 जल्दी ही मिट जाएगी, यह त्रिशुच की पीर ||

सृंगी से कहने लगे, हुआ पूर इक साल |
शांता को भिजवाइए, अब अपनी ससुराल ||
 
कार्य यहाँ के पूर्ण कर, करिए अब प्रस्थान |
बड़ी समस्या का करें, समुचित शीघ्र निदान ||

हाथ जोड़कर बोलते, सृंगी मन की बात |
सहमत ऋषिवर हो गए, बतिया बड़ी सुहात ||

जाय संभालो राज को, शांता को ले जाव |
पड़े  रास्ते  में  अवध, भाई से मिलवाव ||

मात पिता के चरण छू, परम बटुक ले साथ |
रामचंद्र  को  भेंटते , देव भूमि के पाथ ||

चरण छुवे भ्राता सभी, पाते आशीर्वाद |
शांता को आते रहे,  पूरे  रस्ते  याद ||

दशरथ, तीनों रानियाँ, आवभगत में लाग |
इन अभिनव मेहमान से, भाग अवध के जाग ||

सारी परजा आ गई, करती जय जयकार |
उपहारों का लग गया, बहुत बड़ा अम्बार ||

सृंगी शांता बोलते, हम सन्यासी लोग |
चीजें संचय न करें, करे नहीं अति भोग ||

कृपा करके दीजिये, अनुमति हे श्रीमान |
ढूंढ़ जरूरतमंद को, बांटो यह सामान ||

कौशल्या मानी नहीं, मेवा फल मिष्ठान |
दो दिन खातिर संग में, बाँधीं कुछ पकवान || 

पलकों पर बैठा रहे, देवभूमि के लोग |
भीगी आँखें बरसती, वर्षा का संयोग ||

राजकाज में जा फंसे, रिस्य सृंग महराज |
प्रमुख सभी आने लगे, प्रेम-पालकी साज ||

कर सबको आश्वस्त तब, रिस्य रिसर्चर राज |
कर्म गूढ़ करने लगे, सिरमौरी को साज ||

रिस्य गुफा में कर रहे, बैठ लोक-कल्यान |
बटुक परम चढ़ता रहा, शिक्षा के सोपान ||  

उधर अंग में मच रहा, उथल-पुथल गंभीर |
रूपा को लग ही गए,  कामदेव के तीर ||

अंगराज अब स्वस्थ हैं, महामंत्री  संग |
मुश्किल हल करते रहे, प्रगति-पंथ पर अंग ||

शाला में बाला बढीं, नया भवन बनवाय |
आचार्या बारह नई, माली श्रमिक बुलाय ||

इंतजाम उत्तम किया, फैले यश चहुँ ओर |
पुंड्रा बंग विदेह जन, शाला रहे अगोर ||

परिवर्तन आया सुखद, आगे बढ़ता अंग |
नीति-नियम से चल रही, शाला नूतन ढंग ||

सोम सदा आता रहा,  कन्या-शाला पास |
रूपा से करता रहे, बातें चुप-चुप ख़ास ||

राजमहल जाने लगी, रूपा भी  दो बार |
गंगा तट पर विचरती, आई नई बहार ||

सोम फ़िदा उसपर हुए, मीठीं बातें बोल |
रूपा के तनबदन में, रहे  प्रेम-रस घोल ||

रूपा को व्याकुल करे, शांता केर विछोह |
भटके मन हो बावली, होय सोम से मोह ||

तरुण सोम चंचलमना, चल शाळा की ओर |
मानो कोई खींचता,  कठपुतली की डोर ||
 
शांता नित करती रही, कन्या-शाळा याद |
प्राकृति पहुंचाई वहाँ, रूपा का उन्माद  ||

अनमयस्क सी शांता, रहने लगी उदास |
कार्य सिद्ध करके ऋषी, लौटे शांता पास ||

बारिस की बूंदें गिरीं, बीत रहा इक माह |
मैके जाना चाहिए, शांता करे सलाह || 

फेरे की इक रस्म है, करिए उसको पूर |
नदी मार्ग से जाइए, अंगदेश अति दूर ||

हुई पालकी में विदा, ऊँचीं नीची राह |
धीरे-धीरे छूटते, गिरी कन्दरा गाह ||


तेज धार धीमी हुई, आया सम मैदान |
नाविक गण फिर थामते, यात्रा केर कमान ||
 
निश्चित तिथि पर चल पड़ी, परम बटुक के साथ |
नाव सजा के बैठती, गंगा जल ले माथ ||

5 comments:

  1. खाने के लाले पड़े, नंगे होंय पहाड़ |
    हिंसक जीवों की वहाँ, गूंजे लगी दहाड़ ||

    आज भी यही स्थिति है बंधुवर॥

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  2. इस रामकथा की पूर्णता के लिए शुभकामनायें !

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  3. सुन्दर प्रस्तुति...

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  4. मैं तो मन्त्रमुग्ध सी पढती रही, और अब निशब्द हूँ ...पर निशब्द हो आना ही अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है.....

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