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19 January, 2013

चिंतन शिविर हमारी खातिर -


लुटे दामिनी रोज ही, जो चाहे सो लूट ।
लूट लुटेरे फूट लें, पर थानों में फूट ।
  इक इक कर अधिकारी खिसके ।
 चिंतन शिविर वास्ते किसके ?


संसाधन नीलाम हों, मनु-मिनरल-फारेस्ट ।
करें विदेशी मस्तियाँ, बन सत्ता के गेस्ट ।
करते पिकनिक चन्दन घिसके ।
 चिंतन शिविर वास्ते किसके ?


लेवी उधर वसूलते, नक्सल के उत्पात ।
पुलिस तंग करती इधर, दोनों करते घात ।
मरती है यूँ पब्लिक पिसके ।
 चिंतन शिविर वास्ते किसके ?


दुर्गम सीमा देश की, रहे कर्मरत फौज ।
शीश शहीदों के कटें, यहाँ मौज ही मौज ।
क्यूँ जाने, घरवाले सिसके  । 
 चिंतन शिविर वास्ते किसके ?

विकट बोलबाला दिखे, प्रभु-सम भ्रष्टाचार ।
पुहुप-वास से पातरा, पूजें भक्त अपार ।
 भगवन भी हैं बस में जिसके ।
   चिंतन शिविर वास्ते किसके ?

पीढ़ी दर पीढ़ी चले, सीढ़ी चढ़े प्रवीन ।
आसमान में विचरते, समझें कहाँ जमीन ।
सारे पद तो पीछे इसके ।
  चिंतन शिविर वास्ते किसके ?

12 comments:

  1. चिंतन शिविर की अच्छी बखिया उधेडी है आपने !!

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  2. वाह!
    आपकी यह पोस्ट कल दिनांक 21-01-2013 के चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  3. दुर्गम सीमा देश की, रहे कर्मरत फौज ।
    शीश शहीदों के कटें, यहाँ मौज ही मौज ।
    क्यूँ जाने, घरवाले सिसके ।
    चिंतन शिविर वास्ते किसके ?

    खूब निचोड़ के मारा है ,

    चिंतन शिविर हमारा है .

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  4. Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ रविवार, 20 जनवरी 2013 .फिर इस देश के नौजवानों का क्या होगा ? http://veerubhai1947.blogspot.in/
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  5. लेवी उधर वसूलते, नक्सल के उत्पात ।
    पुलिस तंग करती इधर, दोनों करते घात ।
    मरती है यूँ पब्लिक पिसके ।
    चिंतन शिविर वास्ते किसके ?

    बहुत सही व सटीक ,,,,
    सादर !

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  6. लाजवाब...बहुत बहुत बधाई...

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  7. मातम मनते हैं इधर, मने उधर हैं जश्न
    नई विधा मन भा गई,दोहों के सँग प्रश्न ||

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  8. Ravikr bhi hai kam nahI*** kare tippdi, likhe tippdi,padhe tippdi, chot kare damdar

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  9. सरल भाषा में जटिल व्यंग्य । काव्य-रस और शिल्प लाजबाब हैं।

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