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15 February, 2013

अब मांगी है जान, नहीं माने मँहगाई -




गाई मँहगाई गई, नई नवेली सोच ।
अलबेली देवी दिखे, पीती रक्त खरोच ।

पीती रक्त खरोच, लगे ईंधन का चस्का ।
करती बंटाधार, मार मंत्री मकु मस्का ।

चढ़े चढ़ावा तेल, पुन: चीनी झल्लाई ।
 अब मांगी है जान, नहीं माने मँहगाई ।।

पश्चिम से होती हलचल ।
ताप गिरे दिन-रात का, ठंडी बहे बयार ।
ओले पत्थर गिर रहे, बारिस देती मार ।।
सागर के मस्तक पर बल ।
पश्चिम में होती हलचल ।।
शीत-युद्ध सीमांतरी, हो जाता है गर्म ।
चलते गोले गोलियां, शत्रु छेदता मर्म ।।
 काटे सर करके वह छल ।
पश्चिम में होती हलचल ।।
उड़न खटोला चाहिए, सत्ता मद में चूर ।
बटे दलाली खौफ बिन, खरीदार मगरूर ।
चॉपर अब तो तोपें कल ।
पश्चिम से होती हलचल ।।
भोगवाद अब जीतता, रीते रीति-रिवाज ।
विज्ञापन से जी रहे, लुटे हर जगह लाज ।
पीते घी ओढ़े कम्बल ।
पश्चिम में होती हलचल ।।
 परम्पराएँ तोड़ता, फिर भी दकियानूस ।
तन पूरब का ढो रहा, पश्चिम मन मनहूस । 
बदले मानव अब पल पल ।
पश्चिम में होती हलचल ।।
 

जब धरा पे है बची बंजर जमीं, बीज सरसों का उगा ले हाथ पर

 

4 comments:

  1. माई माई कर रहे, महगाई रही मार ।
    रेट बढ़ा पेट्रोल का ,डीजल की भी धार।
    डीजल की भी धार ,मार महगाई जाती ।
    कैसा ये ब्यापार ,दिनों -दिन टीस बढ़ाती ।
    कहते सुन लोकेश ,किराया बढ़ता जाता ।
    जब जाओ बाजार ,किराना महंगा आता ।

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  2. बढ़िया प्रस्तुति .रोज़ महंगाई के तोहफे ,और भ्रष्टाचार,देख लो सरकार- को ,है बड़ी लाचार .,करे नित टूजी -कोलगेट ,अरे भई! हेलिकोप्टर ,करो भई रविकर पूर्ती .

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  3. भावपूर्ण काव्य रचना,आभार.

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