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29 August, 2016

शीलहरण पे पढ़ रही, भीड़ व्याह के मन्त्र

धर्म-कर्म पर जब चढ़े, अर्थ-काम का जिन्न |
मंदिर मस्जिद में खुलें, नए प्रकल्प विभिन्न ||1||

मजे मजे मजमा जमा, दफना दिया जमीर |
स्वार्थ-सिद्ध सबके हुवे, लटका दी तस्वीर ||2||


शीलहरण पे पढ़ रही, भीड़ व्याह के मन्त्र |
सहनशील-निरपेक्ष मन, जय जय जय जनतंत्र ||1||

हीन-भावना का चढ़ा, नशा बड़ा गम्भीर |
किन्तु उच्चता का नशा, रहा कलेजा चीर ||2||


घटना घटती घाट पे, डूब गए छल-दम्भ। 
होते एकाकार दो, तन घटना आरम्भ।।

हीरा खीरा रेतते, लेते इन्हें तराश।
फिर दोनों को बेचते, कर दुर्गुण का नाश।।

तनातनी तमके तनिक, रिश्ते हुवे खराब।
थोडा झुकना सीख लो, मत दो उन्हें जवाब।।

2 comments:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 02/09/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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