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29 March, 2011

चेहरे बदलते जाते, मुखड़ा नकाब में है

चेहरे बदलते जाते, मुखड़ा नकाब में है 
हर कदम पर धोखा, धुत वो शराब में है 
                 हर कदम पे बदला, बदला ज़माना सारा 
                 लोहा न लकड़ी काटे, मानव खराद में है
युवा छात्र  जिनके हाथों में सेल या पत्थर 
पड़ने में क्या मजा है, जोकि शबाब में है 
                 झुर-मुट में बैठी छात्रा, सजती है सुंदर कापी  
                 मुस्कराना-हँसना, उनके मिजाज़ में है 
सड़के बनाई पक्की, नक्की कराई नहरें 
 जाकर उधर जो देखा, सारा ख्वाब में है
                 कर्मचारी कैसे, पैसे पे करते करतब
                 फिफ्टी बटाते  फिर भी सब-कुछ हिसाब में है
कैसा ज़माना आया, महंगा हुआ है जीना 
कुछ भी इधर चखोगे, तीखा स्वाद में है


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