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23 March, 2011

सुगंध तेरी आती है

दीखते हैं मुझे दृश्य सब मनोहारी 
कुसुम कलिकाओं से सुगंध तेरी आती है

कोकिला की कूक में भी स्वर की सुधा सुन्दर 
प्यार की मधुर टेर सारिका सुनाती है 

देखूं शशि छबि या निहारूं अंशु सूर्य के -
रंग छटा उसमे तेरी ही दिखाती है 

कमनीय कंज कलिका विहस 'रविकर'
तेरे रूप-धूप का सुयश फैलाती है

4 comments:

  1. कल 26/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  3. lajawaab...
    short n sweet n solid...

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