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05 January, 2012

भूली-बिसरी यादें : 1984 की

कातर स्वरों में सब रोने लगे हैं
सूखे हलक खुद के,  भिगोने लगे हैं ||

जागे हैं दुर्गम, अजेय शत्रु सब 
सदाचार शर्मशार सोने लगे हैं ||

'सनक' सदाफल से सुमनों को तोड़
सत्यानाशी ठौर-ठौर बोने लगे हैं ||

लहरों का मिज़ाज बिगड़ जो गया 
सुनामी शहर-ग्राम, झट धोने लगे हैं || 

अपने हिम्मत की दाद देते 'रविकर'
जिन्दा लाशें स्वयं की ढोने लगे हैं ||

10 comments:

  1. बहुत तकलीफें होती हैं जब ऐसे दृश्य दिखते हैं !

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  2. बहुत ही मार्मिक वर्णन ...

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  4. अन्तरस्पर्शी प्रस्तुति....
    सादर

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  5. बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...

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  6. मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...

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