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26 January, 2012

पा-जी अन्ना राव, पिलाओ बाबा घुट्टी ।

काढ़ा गाढ़ा हो चला, बूढ़ा फिर भी त्रस्त ।
पैसठ सालों में शिथिल, बरबस परबस पस्त ।


बरबस परबस पस्त, कहीं न होवे छुट्टी ।
पा-जी अन्ना राव, पिलाओ बाबा घुट्टी ।


चोरी भ्रष्टाचार, मिलावट लालच बाढ़ा --
सत्ता-नब्ज टटोल, अ-सरकारी यह काढ़ा ।।

7 comments:

  1. रविकर जी,
    सामयिक विषयों पर आपकी कुण्डलियाँ लाजवाब होती हैं.
    ... इस बार भी हैं.

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  2. बहुत सुन्दर ,बहुत खूब ..

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  3. पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पर..
    सार्थक हुआ आना..
    जितनी पढ़ीं सभी अच्छी रचनाएँ..
    शुभकामनाएँ

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  4. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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