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22 February, 2012

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) के उत्तर का प्रत्‍युत्तर


रविकर--
 माता होय कुरूप अति, होंय पिता भी अंध |
वन्दनीय ये सर्वदा, अतिशय पावन बंध ||
बंध = शरीर

उच्चारण अतिशय भला, रहे सदा आवाज |
शब्द छीजते हैं नहीं, पञ्च-तत्व कर लाज ||

देव आज देते चले, फिर से पैतिस साल |
स्वस्थ रहेंगे सर्वदा, नौनिहाल सौ पाल ||

रूप चंद्र रस पान करें , रवि रतनारे नैन
सरसों सरसी सुर सधे,मधुर मधुर मधु बैन.

गेहूँ गाय गीत गज़ल, सरसों करे सिंगार
नील वसन में श्याम जू,मानो आये द्वार.

शौक हुआ सिलवा लिया, बंद गले का सूट
सजनी गर तारीफ करें , पैसे जायें छूट.

नेह रेशमी डोर फिर , माँझे का क्या काम
प्रेम पतँगिया झूमती, ज्यों राधा सँग श्याम.

ऋतु आवत जावत रहे, पतझर पाछ बसंत
प्रेम पत्र कब सूखता ? इसकी आयु अनंत.

शास्त्री जी व रविकर जी को सादर............
प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
जबरदस्त ये भाव हैं, निगमागम का रूप ।

तन-मन मति निर्मल करे, कुँवर अरुण की धूप ।।

दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक
dineshkidillagi.blogspot.com
प्रत्‍युत्तर दें

 सम्बंधित दोहे-

आदरणीय रविकर जी ने
मेरे चित्र पर दो टिप्पणियाँ की थी!
रविकर Feb 21, 2012 04:16 AM
गेहूं जामे गजल सा,
सरसों जैसे छंद |
जामे में सोहे भला,
सूट ये कालर बंद ||
प्रत्‍युत्तर दें
उत्तर
रविकर Feb 21, 2012 04:19 AM
सुटवा कालर बंद ||
उसी के उत्तर में पाँच दोहे
आदरणीय रविकर जी को
समर्पित कर रहा हूँ!
-0-0-0-0-0-
रविकर जी को भा रहा, अब भी मेरा रूप
वृद्धावस्था में कहाँ, यौवन जैसी धूप।१।

गेहूँ उगता ग़ज़ल सा, सरसों करे किलोल।
बन्द गले के सूट में, ढकी ढोल की पोल।२।

मौसम आकर्षित करे, हमको अपनी ओर।
कनकइया डग-मग करे, होकर भावविभोर।३।

कड़क नहीं माँझा रहा, नाज़ुक सी है डोर।
पतंग उड़ाने को चला, बिन बाँधे ही छोर।४।

पत्रक जब पीला हुआ, हरियाली नहीं पाय।
ना जाने कब डाल से, पका पान झड़ जाय।५।

9 comments:

  1. बढ़िया लगा संवाद...
    दोहे रुचिकर..

    सादर..

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  2. वाह...वाह...वाह...

    समां ही बाँध दिया आप दोनों विद्व जनों ने मिलकर..

    अतिशय आनंद आया..लगा जैसे मंच के सम्मुख काव्य गोष्ठी में बैठे हों, जहाँ काव्य रस धार बह रही हो..

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  3. वाह ... मज़ा आ गया .. क्या जुगलबंदी है दिनेश जी ...

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  4. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा मंच-798:चर्चाकार-दिलबाग विर्क>

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  5. अहा आप लोगों का शीघ्र कवित्व और जुगल बंदी भी । मज़ा आ गया ।

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  6. अति अति सुन्दर !
    kalamdaan.blogspot.in

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  7. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ...

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  8. सुन्दर काव्य..बहुत ही सुन्दर लिखा है..बधाई...

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  9. आनंद रस वर्षंन रविकर, अरुण, रूप के संग ,खूब छनेगी भंग .

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