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08 April, 2012

दूँ उसको आशीष, होय इक बोदा लड़का-

बोदा लड़का था बड़ा, पर छुटका विद्वान ।
मार-पीट घूमे-फिरे, सारा घर उकतान ।

सारा घर उकतान, करूँ नित मार कुटाई । 
छुटका बसा विदेश, पूर कर बड़ी पढ़ाई ।

रविकर बूढ़ी देह, सेवता घर-भर बड़का ।
बड़के को आशीष, होय इक बोदा लड़का ।।

6 comments:

  1. जंगल में मोर नाचा किसने देखा। जो वक़्त पर मौजूद है वही है।

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  2. मन को उद्वेलित करने वाली रचना...

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  3. ये दर्द है या रचना ... गहरी बात कही है ...

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  4. मर्मस्पर्शी रचना...गहरी अभिव्यक्ति!

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  5. आज के सामाजिक और पारिवारिक ढाँचे को बखान करती बात...!

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  6. छोटे के लिये-
    बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर
    बापू को सेवा नहीं , बस देता नासूर
    बस देता नासूर , बात डालर की करता
    मात पिता का पेट, कहाँ डालर से भरता

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