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20 July, 2012

भगवान् राम की सहोदरा (बहन) : भगवती शांता परम-9

सर्ग-2 
 शिशु-शांता 
भाग-3

कन्या का नामकरण 

कौशल्या दशरथ कहें, रुको और महराज |
अंगराज सह वर्षिणी, ज्यों चलते रथ साज ||

राज काज का हो रहा, मित्र बड़ा नुक्सान |
चलने की आज्ञा मिले,  राजन  हमें  विहान ||

सुबह सुबह दो पालकी, दशरथ की तैयार |
अंगराज रथ पर हुए, मय परिवार सवार ||

दशरथ विनती कर कहें, देते एक सुझाव |
सरयू में तैयार है,  बड़ी राजसी नाव ||

धारा के संग जाइए, चंगा रहे शरीर |
चार दिनों का सफ़र कुल, काहे होत अधीर ||

चंपानगरी दूर  है, पूरे दो सौ कोस |
उत्तम यह प्रस्ताव है, दिखे नहीं कुछ दोष ||

पहुंचे उत्तम घाट पर, थी विशाल इक नाव |
नाविक-गण सब विधि कुशल, जाने नदी बहाव ||

बैठे सब जन चैन से, नाव बढ़ी अति मंद |
घोड़े-रथ तट पर चले, लेकर सैनिक चंद ||

धीरे धीरे गति बढ़ी, सीमा होती पार |
गंगा में सरयू मिली, संगम का आभार ||
 
चार घरी रूककर वहां, पूजें गंगा माय  |
सरयू को परनाम कर, देते नाव बढ़ाय ||

हर्ष और उल्लास का, देखा फिर अतिरेक |
ग्राम रास्ते में मिला, अंगदेश का एक || 

धरती पर उतरे सभी, आसन लिया जमाय |
नई कुमारी का करें, स्वागत जनगण आय |

किलकारे कन्या हँसे, कौला रखती ख्याल |
धरती पर धरती कदम, रानी रही संभाल ||

वैद्यराज की औषधी, वह गुणकारी लेप |
रस्ते भर मलती चली, तीन बार खुब घेप ||


नई वनस्पति फल नए, शीतल नई समीर |
खान-पान था कुल नया, नई नई तासीर || 

अंग देश की बालिका, मंद-मंद मुसकाय |
कंद-मूल फल प्रेम से, अंगदेश के खाय ||

रानी के संग खेलती, बाला भूल कलेश |
राज काज के काम कुछ, निबटा रहे नरेश ||

एक अनोखा वाद था,  ग्राम प्रमुख के पास |
बात सौतिया डाह की, विधवा करती नाश ||

सौतेला  इक  पुत्र  है, सौजा  के  दो  आप |
इक खाया कल बाघ ने, करती घोर विलाप  ||

विषम परिस्थित में अगर, भूले रिश्ते-नात ।  
जिन्दा रहने के लिए, करे अगर आघात ।
करे अगर आघात, क्षमा रविकर कर देते ।
पर उनका क्या मित्र, प्राण जो यूँ ही लेते ।
भरे पेट का शौक, तड़पता प्राणी ताकें ।
दुष्कर्मी बेखौफ, मौज से पाचक फांके ।।


रो रो कर वह बक रही, सौतेले का दोष |
यद्दपि वह घायल पड़ा, करे गाँव अफ़सोस ||


ढर्रा बदलेगी नहीं,  रोज अड़ाये टांग ।
खांई में बच्चे सहित, ममता मार छलांग । 
'ममता' मार छलांग, भूलती मानुष माटी ।
मात्र सौतिया डाह, पुरानी है परिपाटी  ।
रविकर का अंदाज, लगेगा झटका कर्रा ।
बर्रा प्राकृत दर्प, बदल देगी तब ढर्रा ।।


जान लड़ा कर खुब लड़ा, हुआ किन्तु बेहोश |
बचा लिया इक पुत्र को, फिर भी न संतोष ||

बड़ी दिलेरी से लड़ा, चौकीदार गवाह |
एक पुत्र को ले भगा, जंगल दुर्गम राह ||

सौजा को विश्वास है, देने को संताप |
सौतेले ने है किया, घृणित दुर्धुश पाप ||

घर न रखना चाहती, वह अब अपने साथ |
ईश्वर की  खातिर अभी, न्याय कीजिए नाथ ||


दालिम को लाया गया, हट्टा-कट्टा वीर |
चेहरे पर थी पीलिमा, घायल बहुत शरीर ||

सौजा से भूपति कहें, दालिम का अपराध |
ग्राम निकाला दे दिया, रहे किन्तु हितसाध ||

दालिम से मुड़कर कहें, बैठो जाय जहाज  |
छू ले माता के चरण, होना मत नाराज  ||

राजा पक्के पारखी,  है हीरा यह वीर |
पुत्री का रक्षक लगे, कौला की तकदीर ||


ममता में अंधी हुई, अपना पूत दिखाय |
स्वार्थ सिद्ध तृणमूल का, देश भाड़ में जाय |
देश भाड़ में जाय, खाय ले घर का बच्चा |

एक सूत्र जो पाय, चबाती  जाये कच्चा |
देती हृदय हिलाय, कोप क्षण भर में कमता |
मंद मंद मुसकाय, बढ़ी माया से ममता ।।


सेनापति से यूँ कहें, रुको यहाँ कुछ रोज |
नरभक्षी से त्रस्त जन, करिए उसकी खोज ||

जीव-जंतु जंगल नदी, सागर खेत पहाड़ |
बंदनीय हैं ये सकल, इनको नहीं उजाड़ ||

रक्षा इनकी जो करे, उसकी रक्षा होय |
शोषण गर मानव करे, जाए जल्द बिलोय ||

केवल क्रीडा के लिए, मत करिए आखेट |
भरता शाकाहार भी, मांसाहारी पेट ||

जीव जंतु वे धन्य जो, परहित धरे शरीर |
हैं निकृष्ट वे जानवर, खाएं उनको चीर ||

नरभक्षी के लग चुका, मुँह में मानव खून |
जल्दी उसको मारिये, जनगण पाय सुकून ||

अगली संध्या में करें, रजधानी परवेश |
अंग-अंग प्रमुदित हुआ, झूमा पूरा देश ||

गुरुजन का आशीष ले, मंत्री संग विचार |
नामकरण की शुभ तिथी, तय अगले बुधवार || 

नामकरण के दिन सजा, पूरा नगर विशेष |
ब्रह्मा-विष्णु देखते, नारद उमा महेश ||

महा-पुरोहित कर रहे, थापित महा-गणेश |
राजकुमारी आ गई, आये अतिथि विशेष ||

रानी माँ की गोद में, चंचल रही विराज |
टुकुर टुकुर देखे सकल, इत-उत होते काज ||

कौला दालिम साथ में, राजकुमारी पास |
हम दोनों कुछ ख़ास हैं, करते वे एहसास ||

महापुरोहित बोलते, हो जाओ सब शांत |
शान्ता सुन्दर नाम है, फैले सारे प्रांत ||

शान्ता -शान्ता कह उठा, वहाँ जमा समुदाय |
मात-पिता प्रमुदित हुए, कन्या खूब सुहाय ||

कार्यक्रम सम्पन्न हो, विदा हुए सब लोग |
पूँछे कौला को बुला, राजा पाय सुयोग ||

शान्ता की तुम धाय हो, हमें तुम्हारा ख्याल |
दालिम लगता है भला, रखे तुम्हे खुशहाल ||

तुमको गर अच्छा लगे, दिल में तेरे चाह |
सात दिनों में ही करूँ, तेरा उससे व्याह ||

कौला शरमाई तनिक, गई वहाँ से भाग |
दालिम की किस्मत जगी, बढ़ा राग-अनुराग ||

दोनों की शादी हुई, चले एक ही राह |
शान्ता के प्रिय बन रहे, राजा केर पनाह ||

सौम्या सृष्टी सोहिनी, माँ की मंजिल राह ।
सचुतुर, सुखदा, सुघड़ई, दुर्गे मिली अथाह । 
 दुर्गे मिली अथाह, बड़ी आभारी माता ।
ताकूँ अपना अक्श, कृपा कर सदा विधाता ।
हसरत हर अरमान, सफल देखूं इस दृष्टी ।
मंगल-मंगल प्यार, लुटाती सौम्या सृष्टी ।।

पोर-पोर में प्यार है, ममतामयी महान ।
कन्या में नित देखती, देवी का वरदान ।।

सर्ग-2 समाप्त  

10 comments:

  1. कौशल्या दशरथ कहें, रुको और महराज |
    अंगराज सह वर्षिणी, ज्यों चलते रथ साज ||

    ढर्रा बदलेगी नहीं, रोज अड़ाये टांग ।
    खांई में बच्चे सहित, ममता मार छलांग ।
    'ममता' मार छलांग, भूलती मानुष माटी ।
    मात्र सौतिया डाह, पुरानी है परिपाटी ।
    रविकर का अंदाज, लगेगा झटका कर्रा ।
    बर्रा प्राकृति दर्प, बदल देगी तब ढर्रा ।।
    बर्रा प्राकृत दर्प यहाँ पर कर लो भैया .प्रकृति और प्राकृत रूप शुद्ध हैं ,प्राकृति नहीं है भैया ,कान खोल के सुन लो रविकर सुन्दर प्रस्तुति हर दम लाएं अपने भैया ,राम राम भैया .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    शुक्रवार, 20 जुलाई 2012
    क्या फर्क है खाद्य को इस्ट्यु ,पोच और ग्रिल करने में ?
    क्या फर्क है खाद्य को इस्ट्यु ,पोच और ग्रिल करने में ?


    कौन सा तरीका सेहत के हिसाब से उत्तम है ?
    http://veerubhai1947.blogspot.de/
    जिसने लास वेगास नहीं देखा
    जिसने लास वेगास नहीं देखा

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

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  2. Bada gahan likha hai aur vistrut bhee....ek baar fir fursatse padhana chahungi.

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा आज रविवार के  चर्चा मंच  पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. खुद ही लिख डाला है
    अब कौन कुछ कहने वाला है?

    रविकर का अंदाज, लगेगा झटका कर्रा ।
    बर्रा प्राकृत दर्प, बदल देगी तब ढर्रा ।।

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  5. बहुत सुन्दर अद्दभुत लिखा है

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  6. कितना लिख लेते हैं ..

    बहुत सुंदर प्रस्‍तुति !!

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  7. बहुत ही सुन्दर दोहे .....

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  8. बहुत कमाल और अद्भुत रचना, शुभकामनाएँ.

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  9. गहन भाव लिए ... उत्‍कृष्‍ट लेखन ...आभार

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  10. उत्कृष्ट प्रस्तुति |

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