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17 July, 2012

ये सावन की घास, लगा के रखी अड़ंगे-रविकर

"ओबीओ चित्र से काव्य तक प्रतियोगिता" अंक-१६


 कुंडली 

सकल लुनाई ईंट घर , दीमक चटा किंवाड़ ।
घर टपके टपके ससुर, गए दुर्दशा ताड़ । 

गए दुर्दशा ताड़, बांस का झूला डोला
डोला वापस जाय, ससुर दो बातें बोला ।

 करवा ले घर ठीक, काम कुछ पकड़ जवाईं  ।
पर काढ़े वर खीस, घूरता सकल लुनाई ।।  


सकल = समस्त //  शक्ल 
 लुनाई = ईंट में लोना लगना //  लावण्य 



 कुंडली 

इत पीपल उत प्रीत पल, इधर बाँस उत रास ।
इत पटरे पर जिन्दगी, पट रे इक ठो ख़ास ।

पट रे इक ठो  ख़ास, आँख में रंगीनी है ।
सुन्दरता का दास, चैन दिल का छीनी है ।

प्रभु दे डोला एक, बढ़े  हरियाली प्रतिपल ।
डोला मारूँ रोज, कसम से आ इत पीपल  ।।

डोला = झूले में पेंग मारना // दुल्हन विदा करना
कुंडली

रंग-विरंगे पट पहर, दूर शहर की हूर |
किये साज-सज्जा सकल, महज तीन लंगूर |



महज तीन लंगूर, पहर दो झट पट बीता |
झूल चुकी भरपूर, नहीं आया मनमीता |



ये सावन की घास, लगा के रखी अड़ंगे |
हरा हरा चहुँ ओर, दिखें न रंग-विरंगे ||

10 comments:

  1. बहुत बढ़िया रविकर जी..


    सादर
    अनु

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  2. bahut hi sundar chhand aur alankaro ka prayog !

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  3. वाह, पहला वाला जोरदार ।

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  4. Rang-Virang Yatn latta,Dubar Dulhaniyaa Dur |
    Saj Saaj Sajaa Sakal, Saghan Surang Sindur ||

    Saghan Surang Sindur, Sakhi Sajan Sang Sudur |
    Daar Daar Do Dore Daar, Jhur Chuki Bharpur ||

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  5. खट्टे-मीठे रसभरे, होते हैं अंगूर।
    राजनीति में आ गये, अब तो बस लंगूर।।

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  6. साँप तो नहीं है
    पर कुंडली गजब
    की बनाता है
    पहेली हो गया है
    क्या आपको इस
    पहेली का सही
    उत्तर आता है ?

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  7. बहुत बधाइयाँ आदरणीय रविकर जी...

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  8. तीनों ही कुंडलियाँ सुंदर ...
    सादर !

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