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02 November, 2012

सर्ग-5 : भगवती शांता इति

 

श्री राम की सहोदरी : भगवती शांता

पुन: प्रकाशित  

भाग-1

चंपा-सोम
कई दिनों का सफ़र था, आये चंपा द्वार |
नाविक के विश्राम का, बटुक उठाये भार ||

राज महल शांता गई, माता ली लिपटाय |
मस्तक चूमी प्यार से, लेती रही बलाय ||

गई पिता के पास फिर, भूप रहे हरसाय |
स्वस्थ देख करके उन्हें ,फूली नहीं समाय ||

स्वर्ण अशरफ़ी सा रखो, रिश्ते हृदय संजोय । 
 हृदय-तंतु संवेदना, कहीं जाय ना खोय ।
कहीं जाय ना खोय, गगन में पंख पसारो ।
उड़ उड़ ऊपर जाय, धरा को किन्तु निहारो ।
 रिश्ते सभी निभाय, रहें नहिं केवल हरफ़ी 
 कहीं जाय ना खोय, हमारी स्वर्ण अशरफ़ी ।। 
 
क्षण भर फिर विश्राम कर, गई सोम के कक्ष |
रूपा मिल जाती वहाँ, धक्-धक् करता वक्ष ||

रूप मिलती है गले, पर आँखों में चोर |
सोम हमारे हैं कहाँ, अचरज होता घोर ||

वहाँ सोम आये नहीं, किया प्रतीक्षा खूब |
शांता शाळा को चलीं, इन्तजार से ऊब ||

शाला में स्वागत हुआ, हृदय  प्रफुल्लित होय |
अपनी कृति को देखकर, जैसे साधक सोय ||

विदुषी आत्रेयी उधर, गले लगाती आय |
कुछ बाला संकोच वश, खुद को रहीं छुपाय ||

नव कन्याएं देखतीं, कौतूहल वश खूब |
सन्यासिन के वेश में, पूरी जाती ड़ूब ||

आनन्-फानन में जमे, सब उपवन में आय |
होती संध्या वंदना, रूपा दी समझाय ||

परिचय देवी का दिया, दिया ज्ञान का बार |
महाविकट दुर्भिक्ष से,  सबको  गई उबार || 

यह है अपनी शांता,  इनका  आशीर्वाद |
कन्या शाला चल पड़ी, गूंजा शुभ अनुनाद ||

पुत्तुल-पुष्पा थीं बनी, तीन वर्ष में मित्र |
मात-पिता के शोक से, स्थिति रही विचित्र ||

दोनों बालाएं मिलीं, शांता ले लिपटाय |
आंसू पोंछे प्रेम से, रही शीश सहलाय ||

क्रीडा कक्षा का समय, बाला खेलें खेल |
घोड़ा आया सोम का, रूपा मिले अकेल ||

 सौजा रखती माँ सरिस, कन्याओं का ध्यान ।
पाक-कला सिखला रही, भाँति भाँति पकवान ।।


ज़िंदा  है  माँ  जानता, इसका मिला सुबूत ।
आज पौत्र को पालती, पहले पाली पूत ।
पहले पाली पूत, हड्डियां घिसती जाएँ ।
करे काम निष्काम, जगत की सारी माएं ।
 किन्तु अनोखेलाल, कभी तो हो शर्मिन्दा ।
दे दे कुछ आराम मान कर मैया जिन्दा ।। 


कामकाज  में  लीन  है,  सुध  अपनी विसराय |
उत्तम प्राकृत मनुज  की,  ईश्वर  सदा  सहाय ||

भले नागरिक वतन को, करते हैं खुशहाल |
बुरे   हमेशा   चाहते,  दंगे   क़त्ल    बवाल ||

शांता को देखा वहां, आया झट से सोम |
छूता दीदी के चरण , दिल से कहता ॐ ||

चेहरे की गंभीरता,  देती इक सन्देश |
हलके में मत लीजिये, हैं ये चीज विशेष ||

दीदी अब घर को चलो, माता रही बुलाय |
कई लोग बैठे वहाँ,  काका  काकी आय ||

सौजा कौला मिल रहीं, रमणी है बेचैन |
दालिम काका भी मिले, आधी बीती रैन ||

नाव गाँव का कह रही, वो सारा वृतांत |
सौजा पूंछी बहुत कुछ, दालिम दीखे शांत ||
 
पर मन में हलचल मची, जन्मभूमि का प्यार |
 शाबाशी पाता बटुक, करे  ग्राम उद्धार ||

रमणी से मिलकर करे, शांता बातें गूढ़ |
रूपा तो हुशियार है, बना सके के मूढ़ ||

अगले दिन रूपा करे, बैठी साज सिंगार |
जाने को उद्दत दिखे, बाहर राजकुमार ||

शांता आकर बैठती, करे ठिठोली लाग |
सखी हमारी जा रही, कहाँ लगाने आग ||

सुन्दरता को ना लगे, बहना कोई दाग |
 रक्षा खुद करनी पड़े, रखे नियंत्रित राग ||

रूपा को ना सोहता, असमय यह उपदेश |
आया अंग नरेश का, इतने में सन्देश ||

इक जगह पर खड़े हों, सुन अपनी पदचाप ।
अजब गजब अंदाज है, बात करें चुपचाप ।
बात करें चुपचाप, गजब दीवानापन है ।
बारिश में ले भीग, प्रेम रस का आसन है ।
फिर मिलने की बात, भूल से आज नहीं कर ।
सही जाय नहिं पीर, होय नहिं एक जगह पर ।।
 
रूपा को वो छोड़कर, गई पिता के पास |
चिंतित थोडा दीखते, चेहरा तनिक उदास ||

करें शिकायत सोम की, चंचलता इक दोष |
राज काज हित चाहिए, सदा सर्वदा होश ||

आयु मेरी बढ़ रही, शिथिल हो रहे अंग |
किन्तु सोम ना सीखता, राज काज के ढंग ||

उडती-उडती इक खबर, करती है हैरान |
रूपा का सौन्दर्य ही, खड़े करे व्यवधान ||

हुआ राजमद सोम को, करना चाहे द्रोह |
रूपा मम पुत्री सरिस, रोकूँ कस अवरोह ||

तानाशाही सोम की, चलती अब तो खूब |
राजपुरुष जब निरंकुश, देश जाय तब डूब ||

मंत्री-परिषद् में अगर, रहें गुणी विद्वान |
राजा पर अंकुश रहे,  नहीं बने शैतान ||

पञ्च रतन का हो गठन, वही उठाये भार | 
करें सोम की वे मदद, विधिवत करे विचार ||

शांता कहती पिता से, दीजे उत्तर तात |
दे सकते क्या सोम को, रूपा का सौगात ||

करिए इनके व्याह फिर, चुनिए मंत्री पाँच |
महासचिव की आन पे, पर आवै नहिं आँच ||

सहमति में जैसे हिला, महाराज का शीश |
शांता की कम हो गयी, रूपा के प्रति रीस ||


उत्तर मिलता है कभी, कभी अलाय बलाय ।
प्रश्नों का अब क्या कहें, खड़े होंय मुंह बाय ।
खड़े होंय मुंह बाय, नहीं मन मोहन प्यारे ।
सब प्रश्नों पर मौन, चलें वैशाखी धारे ।
वैशाखी की धूम, लुत्फ़ लेता है रविकर ।
यूँ न प्रश्न उछाल, समय पर मिलते उत्तर ।।

तुरत बुलाया भूप ने,  आया जल्दी सोम |
दीदी पर पढ़ते नजर, लगा ताकने व्योम ||

डुग्गी सारे देश में, एक बार बजवाव |
पञ्च-रत्न का करें, अगले मास चुनाव  ||

राज कुंवर लेने चले, जैसे लम्बी सांस |
दीदी के प्रस्ताव से, होता सोम निराश ।|

एक पाख में कर रहे, हम सब तेरा व्याह |
कह सकते हो है अगर, कोई अपनी चाह ||

पिता श्री क्यों कर रहे, इतनी जल्दी लग्न |
फिर रूपा के ख्याल में, हुआ अकेला मग्न ||

शुरू हुई तैयारियां, दालिम खुब हरसाय |
नेह निमंत्रण भेजते, सबको रहे बुलाय ||

रूपा तो घर में रहे, सोम उधर घबरात |
नींद गई चैना गया, रह रहकर अकुलात ||

टूटा दर्पण कर गया, अर्पण अपना स्नेह ।
बोझिल मन आँखे सजल, देखा कम्पित देह ।
देखा कम्पित देह, देखता रहता नियमित ।
होता हर दिन एक, दर्द नव जिस पर अंकित ।
कर पाता बर्दाश्त, नहीं वह काजल छूटा।
रूठा मन का चैन, तड़प के दर्पण टूटा ।। 

शादी के दो  दिन बचे, आये अवध-भुवाल |
कौशल्या के साथ में, राम लखन दोउ लाल ||

सृंगी तो आये नहीं, पहुंचे पर ऋषिराज |
पूर्ण कुशलता से हुआ, शादी का आगाज ||

जब हद से करने लगा, दर्द सोम का पार |
दीदी से जाकर मिला, विनती करे हजार ||
 
दीदी कहती सोम से, सुन ले मेरी बात |
शर्त दूसरी पूर कर, करे व्यर्थ संताप ||

मन की गाँठे खोल दे, पाए मधुरिम स्वाद ।

मन की गाँठों से सदा, बढ़ता दुःख अवसाद ।
बढ़ता दुःख अवसाद, गाँठ का पूरा कोई ।
चले गाँठ-कट चाल, पकड़ के माथा रोई ।
अपना मतलब गाँठ, भगा देते गौ-ठाँठे ।। 
रविकर लागे श्रेष्ठ, खोलना मन की गांठें ।
ठाँठे = दूध न देने वाली 
कौशल्या के पास फिर, गया सोम उस रात |
माता देखे  व्यग्रता, मन ही मन मुस्कात ||

जो मुश्किल में रख सके, मन में अपने धीर |
वही सोच सकता तनय, इक सच्ची तदवीर ||

कौला के जाकर छुओ, सादर दोनों पैर |
ध्यान रहे पर बात यह, जाओ मुकुट बगैर ||
 
उद्दत जैसे ही हुआ, झुका सामने सोम |
कौला पीछे हट गई, जैसे गिरता व्योम ||

अवधपुरी की रीत है, पूजुंगी कल पांव |
छूकर मेरे पैर को,  काहे पाप चढ़ाव ||

कन्याएं देवी सरिस, और जमाता मान |
पैर पूंज दे व्याह में, माता कन्यादान ||

हर्षित होकर के भगा, सीधे दीदी पास |
जैसे खोकर आ रहा, अपने होश-हवाश ||
नेह-निमंत्रण 
परसे  नैना  |
जन्म-जन्म के 
करषे  नैना | |  

प्रियतम को अब
तरसे    नैना  |
कितने  लम्बे-
अरसे   नैना ||

हौले  -  हौले 
बरसे    नैना |
जाते अब तो 
मर से  नैना  ||

अब आये क्यूँ   
घर  से  नैना |
जरा जोर से 
हरसे  नैना ||
दीदी के छूकर चरण, घुसता अपने कक्ष |
हर्षित होकर नाचता, जाना कन्या पक्ष ||

बहन-नारि-गुरु-सखी बन, करे पूर्ण सद्कर्म |
भाव समर्पण का सदा, बनता जीवन-धर्म ||
 
रानी सन्यासिन बने, दासी राजकुमारि |
जीती हर किरदार खुश, नारी विगत बिसारि ||
 
नारी सबल समर्थ है, कितने बदले रूप |
सामन्जस बैठा सहे, वर्षा साया धूप ||
शारीरिक शक्ति तनिक, नारी नर से क्षीन |
अंतर मन मजबूत पर, सहनशक्ति परवीन ।।
सर्ग-5
अंतिम भाग 
पञ्च-रत्न 
शादी होती सोम से, शांता का आभार |
कौला दालिम खुश हुए, पाती रूपा प्यार ||


चाहत की कीमत मिली, अहा हाय हतभाग ।
इक चितवन देती चुका, तड़पूं अब दिन रात ।

तड़पूं अब दिन रात,  आँख पर आंसू छाये ।

दिल में यह तश्वीर, गजब हलचलें मचाये ।

देती कंटक बोझ, इसी से पाई राहत । 

कर्म कर गई सोझ, कोंच के नोचूं चाहत ।।


 
समाचार लेते रहे, शांता सृंगी व्यस्त  |
दुरानुभूती माध्यम, सूर्यदेव जब अस्त ||




परम बटुक को मिल रहा, राजवैद्य का नेह |
साधक आयुर्वेद का, करता अर्पित देह ||

 

कविता कर कर के करे, कवि कुल आत्मोत्थान ।
जैसे योगी तन्मयी, करे ईश का ध्यान ।
करे ईश का ध्यान, शान में पढ़े कसीदे ।
भावों में ले ढाल, ढाल से  सौ उम्मीदें  ।
रोके तेज कटार, व्यंग वाणों को रविकर ।
कायम रख ईमान, हमेशा कविता कर कर ।। 

कौशल्या उत्सुक बड़ी, कन्याशाला घूम |
मन को हर्षित कर गई, बालाओं की धूम ||

गोदी की इक बालिका, आकर करे कमाल |
संस्कारित शिक्षित करे, दो सौ ललना पाल ||

हर बाला इक वंश है, फूले-फले विशाल |
होवे देवी मालिनी,  हरी भरी हर डाल ||

शाळा को हर एक वर्ष, सौ पण का अनुदान |
कौशल्या कहकर चली, बिटिया बड़ी महान ||




राम-लखन के साथ में, शांता समय बिताय |
दूल्हा-दुल्हन की डगर, हक़ से छेके जाय ||

 
स्वर्णाभूषण त्याग दी,  आडम्बर सब त्याग |
भौतिकता से  है  नहीं,  दीदी  को  अनुराग ||

दीदी बोली कीजिये, शर्त दूसरी पूर |
शाळा हरदिन जायगी, रूपा सखी जरूर ||

जिम्मेदारी दीजिये, खींचों नहीं लकीर  |
नारी में शक्ती बड़ी, बदल सके तक़दीर ||

कन्याएं दो सौ वहां, अभिभावक दो एक |
शाला की चिंता हरे, रूपा मेरी नेक ||

बना व्यवस्था चल पड़ी, वह शाळा की ओर |
आत्रेयी को सौंपती, पञ्च-रत्न की डोर ||

आचार्या करने लगी, प्रश्न-पत्र तैयार |
कई चरण की जाँच से, होना होगा पार ||

नियत तिथि पर आ रहे, लेकर सब उम्मीद |
कन्याशाला में टिके,  पढ़ उद्धृत-ताकीद ||

पहला दिन आराम का, हुई ना कोई जाँच |
नगर भ्रमण कोई करे, कोई पुस्तक बाँच ||

कोई बैठा बाग़ में, कोई गंगा तीर |
खेल करे मैदान में, कई सयाने वीर ||

मिताहार कोई वहां, मिताचार से प्यार |
कुछ तो भोजन भट्ट हैं, और कई लठमार ||

सूची इक जारी हुई, बाइस वापस जाव |
बाकी इक्कावन बचे, काया जाँच कराव ||

तेरह इसमें छट गए, अड़तिस गंगा तीर |
डूबी पानी में उधर, ग्यारह की तकदीर ||

सत्ताईस की लेखनी, बाइस हों उत्तीर्ण |
पाँच जनों के हो रहे, ऐसे भाग-विदीर्ण ||

राज महल में मिल गया, सबको एकल कक्ष |
अपने अपने विषय में, थे ये पूरे दक्ष ||

बाइस पहले जो छटे, शाला के प्रति द्वेष |
शिक्षा के प्रति थी नहीं, उनमें रुची विशेष ||

राजकाज के काम दो, दिए एक से जाँय |
तीन दिनों में एक को, आओ सब निपटाय ||

प्रतिवेदन प्रस्तुत करो, लिखकर वापस आय |
एक परीक्षा बचेगी, तेरह  को  बिलगाय ||

गुप्तचरों की सूचना, वा प्रस्तुत आलेख |
महामंत्री ने चुने, प्रतिभागी नौ  देख ||

अगले दिन दरबार में, बैठे अंग नरेश |
नौ के नौ आयें वहां, धर दरबारी भेष ||

साहस संयम शिष्टता, अनुकम्पा औदार्य |
मितव्ययी निर्बोधता, न्याय-पूर्ण सद्कार्य ||

क्षमाशीलता सादगी, सहिष्णुता गंभीर |
सच्चाई प्रफुल्लता, निष्कपटी मन धीर ||

स्वस्ती मेधा शुद्धता, हो चारित्रिक ऐक्य |
दानशीलता आस्तिक, अग्र-विचारी शैक्य ||

सर्वगुणी सब विधि भले, सब के सब उत्कृष्ट |
अंगदेश को गर्व है, गर्व करे यह सृष्ट ||

जाँच-परखकर कर रहे, सबको यहाँ नियुक्त |
एक वर्ष के बाद में, होंय चार जन मुक्त ||

तीन मास बीते यहाँ, आया फिर वैशाख |
शांता सृन्गेश्वर चली, मन में धीरज राख ||

कन्याओं से मिल लिया, पुष्पा-पुत्तुल पास |
रमणी को देकर चली, एक हिदायत ख़ास ||

 बटुक रमण फिर से चला, दीदी को ले साथ |
शिक्षा विधिवत फिर करे, जय हो भोले नाथ ||


आश्रम की रौनक बढ़ी, सास-ससुर खुश होंय |
सृंगी अपने शोध में, रहें हमेशा खोय ||

शांता सेवा में जुटी, परम्परा निर्वाह |
करे रसोईं चौकसी, भोजन की परवाह ||

शिष्य सभी भोजन करें, पावें नित मिष्ठान |
करें परिश्रम वर्ग में, नित-प्रति बाढ़े ज्ञान ||

 
वर्षा-ऋतु में पूजती, कोसी को धर ध्यान |
सृन्गेश्वर की कृपा से, उपजे बढ़िया धान ||
शांता की बदली इधर, पहले वाली चाल |
धीरे धीरे पग धरे, चलती बड़ा संभाल ||
खान-पान में हो रहा, थोडा सा बदलाव |
खट्टी चीजें भा रहीं,  बदले बदले चाव  ||
 
खान-पान पर है सदा , दृष्टि मातु की तेज |
 रखे प्रफुल्लित शांता, आश्रम रखे सहेज ||

पुत्री सुन्दर जन्मती, बाजे आश्रम थाल |
सेवा सुश्रुषा करे, पोसे बहुत संभाल ||

तीन वर्ष पूरे हुए, शिक्षा पूरी होय |
दीदी से बिछुड़े बटुक, चले अंग को रोय || 

फिर पूरे परिवार से, करके वहाँ सलाह |
माँ-दादी को साथ ले, पकड़ें घर की राह || 

आश्रम इक सुन्दर बना, करते हैं उपचार |
साधुवाद है वैद्य जी, बहुत बहुत आभार ||

तीन वर्ष बीते इधर, मिला राज सन्देश |
वैद्यराज का रिक्त पद, तेरे लिए विशेष ||
 
क्षमा-प्रार्थना कर बचे, नहीं छोड़ते ग्राम |
आश्रम फिर चलता रहा, प्रेम सहित अविराम ||
  
रक्षाबंधन पर मिली, शांता घर पर आय |
भागिनेय दो बटुक की, झट से घुल-मिल जाँय ||

पुत्तुल के संग वो रखी, पाणिग्रहण प्रस्ताव |
 सहमति देते हैं बटुक, पर पुत्तुल की लाव ||

शांता लेकर बटुक को, चम्पानगरी जाय |
पुत्तुल के इनकार पर, रही व्यर्थ समझाय ||
 
नश्वर जीवन कर दिया, इस शाळा के नाम |
बस नारी उत्थान हित,  पुत्तुल करती काम ||

पुष्पा से एकांत में, मिलती शांता जाय |
वैद्य बटुक से व्याह हित, मांगी उसकी राय ||

शरमाई बाहर भगी, मिला मूल संकेत |
मंदिर में शादी हुई, मिला वैद्य अनिकेत ||

रूपा से मिलकर हुई दीदी बड़ी प्रसन्न |
गोदी में इक खेलता, दूजा है आसन्न ||

पञ्च रत्न की सब कथा, पूछी फिर चितलाय |
डरकर नकली असुर से, भाग चार जन जाँय ||

पञ्च-रतन को एक दिन, दे अभिमंत्रित धान | 
खेती करने को कहा, देकर पञ्च-स्थान ||

बढ़िया उत्पादन हुआ, मन सा निर्मल भात |
खाने में स्वादिष्टतम, नहीं घात-प्रतिघात ||

राज काज मिल देखते, पंचरत्न सह सोम |
महासचिव का साथ है, कुछ भी नहिं प्रतिलोम ||

पिताश्री ने एक दिन, सबको लिया बुलाय |
पंचरत्न में चाहिए, स्वामिभक्त अधिकाय ||

चाटुकारिता से बचो, इंगित करिए भूल |
राजधर्म का है यही, सबसे बड़ा उसूल ||



औरन की फुल्ली लखैं , आपन  ढेंढर  नाय
ऐसे   मानुष   ढेर  हैं,   चलिए  सदा  बराय||

जीवन हो निर्बुद्धि का, सुख-दुःख से अन्जान |
निर्बाधित जीवन जिए,  डाले नहिं व्यवधान  ||

बुद्धिवादी परिश्रमी,  पाले  घर  परिवार |
मूंछे  ऐठें  रुवाब से,  बैठे  पैर  पसार  ||

बुद्धिजीवी  का  बड़ा, रोचक  है  अन्दाज |
जिभ्या ही करती रहे, राज काज आवाज ||

बुद्धियोगी  हृदय  से,  लेकर  चले समाज |
करे भलाई जगत का, दुर्लभ हैं पर आज ||

लेकर सेवा भावना, देखो भाग विभाग |
पैदा करने में लगो, जनमन में अनुराग ||

मात-पिता से पूछ के, कुशल क्षेम हालात |
होकर के संतुष्ट फिर, शांता वापस जात ||

कुशल व्यवस्थापक बनी, हुई भगवती माय |
पाली नौ - नौ  पुत्रियाँ,  आठो  पुत्र पढ़ाय ||

 जौ जौ आगर वे सभी, हैं विदुषी विद्वान |
शोध भाष्य करते रहे, पढ़ते वेद -पुरान ||

वैज्ञानिक सुत श्रेष्ठ सब, मन्त्रों पर अधिकार |
अपने अपने ढंग से, सुखी करें संसार || 

 
कर्तव्यों का निर्वहन, करते ऋषी महान |
राजकाज कुल साध के, कर जाते प्रस्थान ||

वन खंडेश्वर को गए, बिबंडक महराज |
भिंड आश्रम को सजा, करे वहां प्रभु-काज ||

आठ पौत्रों से मिले, सब है बेद-प्रवीन |
बड़े भिंड के हो गए, आश्रम में आसीन ||
 
सौंपें सारे ज्ञान को, बाबा बड़े महान |
स्वर्ग-लोक जाकर बसे, छोड़ा यह अस्थान ||

भिन्डी ऋषि के रूप में, हुए विश्व विख्यात |
सात राज्य में जा बसे, पौत्र बचे जो सात ||


एक अवध में जा बसे, सरयू तट के पास |
बरुआ सागर आ गया, एक पुत्र को रास ||

विदिशा जाकर बस गए, सबसे छोटे पूत |
पुष्कर की शोभा बढ़ी, बाढ़ा वंश अकूत ||

आगे जाकर यह हुए, छत्तीस कुल सिंगार |
छ-न्याती भाई यहाँ, अतुलनीय विस्तार ||

बसे हिमालय तलहटी, चौरासी सद्ग्राम |
वंशज सृंगी के यहाँ, रहते हैं अविराम || 

 
सृंगी दक्षिण में गए, पर्वत बना निवास |
ज्ञान बाँट करते रहे, रही शांता पास ||

वंश-बेल बढती रही, तरह तरह के रूप |
कहीं मनीषी बन रमे, हुए कहीं के भूप ||

मंत्रो की शक्ती प्रबल, तंत्रों पर अधिकार |
कलियुग के प्रारब्ध तक, करे वंश व्यवहार ||

हुए परीक्षित जब भ्रमित, कलियुग का संत्रास |
स्वर्ण-मुकुट में जा घुसा, करता बुद्धी नाश  ||

सरिता तट पर एक दिन, लौटे कर आखेट |
लोमस ऋषि से हो गई, भूपति की जब भेंट ||

बैठ समाधि में रहे, राजा समझा धूर्त |
मरा सर्प डाला गले, जैसे शंकर मूर्त ||

वंशज देखें सृंग के, भर अँजुरी में नीर |
मन्त्रों से लिखते भये, सात दिनों की पीर ||

यही सर्प काटे तुम्हें, दिन गिनिये अब सात |
गिरे राजसी कर्म से, सहो मृत्यु आघात ||

मन्त्रों की इस शक्ति का, था राजा को भान |
लोमस के पैरों पड़ा,  राजा का अज्ञान ||
 i
लेकिन भगवत-पाठ सुन, त्यागा राजा प्रान |
यह पावन चर्चित कथा, जाने सकल जहान || 


मत्तगयन्द सवैया 

 
संभव संतति संभृत संप्रिय, शंभु-सती सकती सतसंगा ।

संभव वर्षण  कर्षण कर्षक, होय अकाल पढ़ो मन-चंगा ।
पूर्ण कथा कर कोंछन डार, कुटुम्बन फूल फले सत-रंगा ।
स्नेह समर्पित खीर करो, कुल कष्ट हरे बहिना हर अंगा ।।
जय जय भगवती शांता परम

6 comments:

  1. आपने पुन: प्रकाशित किया है तो हम भी पुन: पढ लेते है, लेकिन पढने में कुछ समय लगेगा। क्योंकि आपकी मेहनत की लम्बाई काफ़ी दिख रही है।

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  2. पुनः पढने में बी आनंद आ रहा है ।

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  3. नेह-निमंत्रण
    परसे नैना |
    जन्म-जन्म के
    करषे नैना | |

    प्रियतम को अब
    तरसे नैना |
    कितने लम्बे-
    अरसे नैना ||

    हौले - हौले
    बरसे नैना |
    जाते अब तो
    मर से नैना ||

    अब आये क्यूँ
    घर से नैना |
    जरा जोर से
    हरसे नैना ||

    सुन रविकर के बैन री मैना .बढ़िया कथांश अपना अलग काव्यात्मक तेवर और दिनमान लिए .

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  4. अद्भुत है लेखन आपका...

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  5. नेह-निमंत्रण
    परसे नैना |
    जन्म-जन्म के
    करषे नैना | |

    प्रियतम को अब
    तरसे नैना |
    कितने लम्बे-
    अरसे नैना ||

    हौले - हौले
    बरसे नैना |
    जाते अब तो
    मर से नैना ||

    अब आये क्यूँ
    घर से नैना |
    जरा जोर से
    हरसे नैना ||

    रोज़ करके जातें हैं यहाँ टिप्पणियाँ ,

    मेट जातीं हैं हवाएं .

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