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19 March, 2013

आदरणीय प्रतुल जी : आइये

इड़ा पिंगला साध लें, मिले सुषुम्ना गेह ।
बरस त्रिवेणी में रहा, सुधा समाहित मेह ।..

 सुधा समाहित मेह, गरुण से कुम्भ छलकता ।
संगम दे सद्ज्ञान , बुद्धि में भरे प्रखरता  ।

रविकर शिव-सत्संग, मगन-मन सुने इंगला ।
कर नहान तप दान, मिले वर इड़ा-पिंगला। 
 
इंगला=पृथ्वी / पार्वती / स्वर्ग
  इड़ा-पिंगला=सरस्वती-लक्ष्मी (विद्या-धन )

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-24



 

(१)
दुर्मिल सवैया

इबराहिम इंगन इल्म इहाँ इजहार मुहब्बत का करता ।

पयगम्बर का वह नाम लिए कुल धर्मन में इकता भरता ।

कह कुम्भ विशुद्ध जियारत हज्ज नहीं फतवावन से डरता ।

इनसान इमान इकंठ इतो इत कर्मन ते जल से तरता ॥
इंगन=हृदय  का भाव
इकंठ=इकठ्ठा

(२)
सुंदरी सवैया

हरिद्वार, प्रयाग, उजैन मने शुभ  नासिक कुम्भ मुहूरत आये ।

जय गंग तरंग सरस्वति माँ यमुना सरि संगम पावन भाये ।

मन पुष्प लिए इक दोन सजे, जल बीच खड़े तब धूप जलाये ।

इसलाम सनातन धर्म रँगे दुइ हाथन से जल बीच तिराए ॥

7 comments:

  1. धर्म के मर्म को समझाती शानदार कुंडलियाँ !!

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  2. बढ़िया प्रस्तुति श्रेष्ठ लेखन आपकी टिप्पणियाँ हमें भी प्रेरित करतीं हैं .

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  3. बहुत ही बेहतरीन कुंडलियाँ आदरणीय,सादर नमन.

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  4. हर विधा में माहिर है आप कविवर !

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  5. तत्वपूर्ण ,अर्थपूर्ण,
    सद्भाव एवं सुरुचिपूर्ण!

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  6. हर घटना पर आपकी कु़ंडली रूप टिप्पणी सटीक होती है ।

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