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30 June, 2013

बड़ी चुनौती है यही, सभी चाहते प्यार-

रोना कितने भूलते, सोना हुआ हराम । 
गिरते गिरते गिर गए, जो सोने के दाम । 

समझे मन के भाव को,  रविकर सत्य सटीक । 
कभी नहीं हैरान हो, ना रिश्तों में हीक ॥ 

बड़ी चुनौती है यही, सभी चाहते प्यार । 
किन्तु जहाँ  देना पड़े, झट करते तकरार ॥

है उदास दासत्व से, सो आवे ना रास |
है निराश मन सिरफिरा, करता त्रास हताश ||


 चेतन चेतावनी प्रति, होते नहिं गंभीर |
दिखे *चेतिका चतुर्दिश, जड़ हो जाय शरीर ||
*श्मशान 

थाली का बैगन नहीं , बैंगन की ही थाल |
जो बैंगन सा बन रहा, गली उसी की दाल ||


हो गलती का लती जो, खायेगा वह लात |
पछताये कुछ ना मिले, गर समझे ना बात ||  

5 comments:

  1. वाह श्लेष प्रस्तुत कर दिया भारतीय राजनीति के बैंगनों का ....सबसे बड़ा बैंगन कौन है आज जानते हैं इस मनमोहन को सब .बढ़िया प्रस्तुति .

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  2. बहुत खूब सर!


    सादर

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  3. थाली का बैंगन नही बैंगन की ही थाल ।
    क्या कहने । बहुत खूब ।

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