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23 July, 2013

दंगे से नंगे हुवे, आई एम् बके शकील -

सकते में हैं आमजन, सुनकर नई दलील 
दंगे से नंगे हुवे, आई एम् बके शकील 

आई एम् बके शकील,  कील आखिरी लगाईं 
गया गो-धरा भूल,  भूल जाता अधमाई

 दंगों का इतिहास, कहीं पूरा जो बकते 
 लगा विकट आरॊप,  भला फिर कैसे सकते

3 comments:

  1. शर्म इनको मगर नई आती ...

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  2. शर्म तो बेच खाई है, बहुत ही सटीक रचना.

    रामराम.

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