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29 August, 2013

आइ सी यू में जिंदगी, हवा हो रहे नोट -

हुआ रिएक्शन दवा का, ले बिन देखे घोट |
आइ सी यू में जिंदगी, हवा हो रहे नोट |

हवा हो रहे नोट, पल्स पर नजर गढ़ाए |
गायब फ़ाइल मोट, फूड जन-गण बहकाए |

रविकर तिकड़ी देख, दे रहा देश बददुआ |
छाया नशा चुनाव, लिया पी जैसे महुआ |



वंशीधर का मोहना, राधा-मुद्रा मस्त । 

नाचे नौ मन तेल बिन, किन्तु नागरिक त्रस्त । 


किन्तु नागरिक त्रस्त, मगन मन मोहन चुप्पा । 

पाई रहा बटोर, धकेले लेकिन कुप्पा । 


बीते बाइस साल, हुई मुद्रा विध्वंशी । 

चोरों की बारात, बजाये रविकर वंशी ॥ 

3 comments:

  1. बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति.हार्दिक बधाई और शुभकामनायें!
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/

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  2. भाई रविकर जी!कृष्ण-जन्माष्टमी की कोटि कोटि वधाइयां !!
    झोला छाप डॉक्टरों पर और मुद्रा-ह्रास पर दोनों व्यंग्य ही बेजोड हैं |

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