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14 November, 2013

सृंगी जन्मकथा : भगवती शांता : मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन


 सर्ग-२ 

भाग-4 
सृंगी जन्मकथा

 रिस्य विविन्डक कर रहे, शोध कार्य संपन्न ।
विषय परा-विज्ञान मन, औषधि प्रजनन अन्न ।

विकट तपस्या त्याग तप, इन्द्रासन हिल जाय ।
तभी उर्वशी अप्सरा, ऋषि सम्मुख मुस्काय ।

शोध कार्य हित हो रही, स्वयं उर्वशी पेश ।
ऋषि-पत्नी रखने लगी, उसका ध्यान विशेष ।

इस अतीव सौन्दर्य पर, होते ऋषि आसक्त ।
औषधि प्रजनन शोध पर, अधिक दे रहे वक्त ।

इधर उर्वशी कर रही, कार्य इंद्र का सिद्ध ।
धीरे धीरे प्रेम भी, होने लगा समृद्ध।

ऋषि-पत्नी फिर एक दिन, करवा देती व्याह ।
प्रेम-पल्लवन के लिए, खुली चतुर्दिक राह ।

एक वर्ष पश्चात ही,  पुत्र -जन्म हो जाय ।
गई उर्वशी स्वर्ग को, देती उन्हें थमाय ।।

हुवे विविन्डक जी दुखी, पुत्र जन्म के बाद ।
मस्तक पर दो सृंग हैं , सुन विचित्र अनुनाद ।

फिर भी प्यारा पुत्र यह, माता करे दुलार ।
ऋषिवर को पकड़ा रही, खोटी-खरी हजार ।

अपनी खोजों से किया, गर्भ गलत उपचार ।
इसीलिए तो शीश का, है  विचित्र आकार ।।

कोसी तट पर पल रहा, आश्रम का यह नूर ।
 गुप्त रूप से पालते, श्रृंग करें मजबूर ।

सृंगी तेरह बरस के, वह सुरम्य वनभाग ।
उच्च हिमालय तलहटी, सरिता झील तड़ाग ।

शिक्षा दीक्षा नियम से, ज्ञान उपासक श्रेष्ठ ।
नारी से अनजान हैं, चिंतित होते ज्येष्ठ ।

सत्पोखर में फिर बसे, रिस्य विविन्डक आय ।
संगम कोसी-गंग का, दृश्य रहा मनभाय ।

सृंगेश्वर की थापना, सृंगी से करवाय ।
देश भ्रमण हित चल दिए, पति पत्नी मुनिराय ।

जोर शोर से फैलता, सृंगेश्वर का नाम ।
राजा रानी अंग के, आ पहुंचे इक शाम ।।   

मंदिर में तम्बू लगा, करते सब विश्राम ।
शांता रूपा चंचला, घूम रही निष्काम ।

छोटी छोटी बालिका, जाती आश्रम बीच ।
सृंगी अपने कक्ष में, ध्यावें आँखे मीच ।

रूपा की शैतानियाँ, ध्यान हो गया भंग ।
इक दूजे को देख के, सृंगी-शांता  दंग ।।

सृंगी पहली मर्तवा, देखें बाला रूप । 
कन्याओं का वेश यह, उनको लगा अनूप ।। 

सोहे सृंगी सृंग से, शांता के मन भाय।
वह भी परिचय दे रही, उनका परिचय पाय ।

बाल सुलभ मुस्कान से, तृप्त हृदय हो जाय ।। 
 मातु-पिता के पास फिर, वह उनको ले जाय ।

इन बच्चों को देखकर, होते सभी प्रसन्न । 
सृंगी जी संकोच में,  ग्रहण करें नहिं अन्न । 

तीन दिनों का यह समय, सृंगी के अनमोल । 
सार्वजनिक जीवन हुआ, भाये शांता बोल ।। 

सर्ग-2 समाप्त  

8 comments:

  1. बहुत सुंदर.कविता के माध्यम से कथा की यह विधा प्रशंसनीय है.

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (16-11-2013) "जीवन नहीं मरा करता है" चर्चामंच : चर्चा अंक - 1431” पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  3. वास्तविकता में आदरणीय , बहुत बढ़िया रचना
    नया प्रकाशन --: प्रश्न ? उत्तर -- भाग - ६
    " जै श्री हरि: "

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  4. शृंगी ऋषि की यह कथा और शांता शृंगी आकर्षण का यह प्रसंग सुंदर चित्रित हुआ है।

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  5. बहुत ही सुंदर शृंगी की जन्म एवं प्रेम कथा है । बधाई आ0 रविकर जी ।

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