Follow by Email

24 January, 2014

मैं तुम हम अहम्

हमाहमी में रहनुमा, जाय भाड़ में देश |
अहम् रहे हरदम अहिम, भोगे जन-गण क्लेश |

भोगे जन-गण क्लेश, लूट का फल पायेगा |
आया खाली हाथ, हाथ खाली जाएगा |

रविकर बदलो सोच, चार दिन का जब मे'हमाँ । 
मत कर अत्याचार, आम जन सहमा सहमा |। 

त्राहिमाम उच्चार, हुआ प्रभुमै मै मैगल

 

(१)
मै-मैगल अंकुश-रहित, *गलगाजन जलकेलि  |
पग जकड़े गलग्राह जब, होय बंद अठखेलि |
मैगल=हाथी    गलगाजन=आनंद से गरजना

होय बंद अठखेलि, ताल में ताल ठोंकते  |
लड़ें युद्ध गज-ग्राह, समूची शक्ति झोंकते |

शिथिल होंय पद-चार, शुण्ड ऊपर कर विह्वल |
त्राहिमाम उच्चार, हुआ प्रभुमै मै मैगल ॥

(२)
तुम तुमड़ी तुल तुक तुमुल, सुन नागिन-मन नाँच |
बिसराऊँ सुध-बुध जहर, शुद्ध तत्त्व हों पाँच |

शुद्ध तत्त्व हों पाँच, दूर हों नाग विषैले |
पड़े तुम्हारी आँच, कीर्ति दुनिया में फैले |

रविकर दर्शन साँच, भीड़ भारी है उमड़ी |
काँचुलि काँचन कांति, बढ़ाये तुर तुम तुमड़ी || 

10 comments:

  1. अनुसन्‍धान जबर्दस्‍त है।

    ReplyDelete
  2. प्रभावशाली
    बहुत सुंदर---!!!!!

    ReplyDelete
  3. मित्रवर!गणतन्त्र-दिवस की ह्रदय से लाखों वधाइयां !
    रचना अच्छी है !कटुसत्य कथन में आपका जबाब नहीं !!

    ReplyDelete
  4. हमाहमी में रहनुमा, जाय भाड़ में देश |
    अहम् रहे हरदम अहिम, भोगे जन-गण क्लेश |

    भोगे जन-गण क्लेश, लूट का फल पायेगा |
    आया खाली हाथ, हाथ खाली जाएगा |

    सत्य वचन।

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (27-01-2014) को "गणतन्त्र दिवस विशेष" (चर्चा मंच-1504) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    ६५वें गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  6. हमाहमी में रहनुमा, जाय भाड़ में देश |
    बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  7. हमाहमी में रहनुमा, जाय भाड़ में देश |
    अहम् रहे हरदम अहिम, भोगे जन-गण क्लेश |

    भोगे जन-गण क्लेश, लूट का फल पायेगा |


    आया खाली हाथ, हाथ खाली जाएगा |



    रविकर बदलो सोच, चार दिन का जब मे'हमाँ ।
    मत कर अत्याचार, आम जन सहमा सहमा |।

    इस रचना का हर बंद कीमती और अर्थ पूर्ण है (१) और (२)की खूबसूरती देखते बनती है .

    ReplyDelete