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11 October, 2014

बाल-कविता

ता ता थैया ता ता थैया |
मैया लेती रही बलैया |

भैया ज्यों कछुवा छुवा, बहना दी चिल्लाय |
जो तितली थी तली में, वो ऊपर उड़ जाए |
बड़ी जोर झल्लाया भैया |
ता ता थैया ता ता थैया ||

खले साँप सीढ़ी चढ़े, कैरम में रम जाय । 
लूडो की गोटी बढे, जहाँ पलक झपकाय । 
समझे खुद को बड़ा खिलैया । 
ता ता थैया ता ता थैया ।।

गौरैया का घोसला, अंडे उसमे चार ।  
भैया क्यों माने भला, लेता उन्हें उतार । 
चीं-चीं कर खीजे गौरैया । 
ता ता थैया ता ता थैया |। 

गैया का बछड़ा भला, बहना करे दुलार । 
बछड़े को वह रोटियां , रोज खिलाये चार । 
बड़ी वत्सला काली गैया ॥ 
ता ता थैया ता ता थैया |।

बहन रंगोली से सुबह, सजा रही थी द्वार ।
भैया अपनी गेंद को, रहा वहीँ पर मार ।
उसके कान उमेठे मैया ।
ता ता थैया ता ता थैया ।।

10 comments:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 12/10/2014 को "अनुवादित मन” चर्चा मंच:1764 पर.

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  2. सभी मित्र परिवारों को आज संकष्टी पर्व की वधाई ! सुन्दर प्रस्तुतीक्र्ण बालसुलभ !

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  3. बहुत सुंदर

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  4. बहन रंगोली से सुबह, सजा रही थी द्वार ।

    भैया अपनी गेंद को, रहा वहीँ पर मार ।

    उसके कान उमेठे मैया ।

    ता ता थैया ता ता थैया ।।

    अति सुंदर. बधाई

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  5. हाहाहा
    मनभावना ! :)

    मेरे ब्लॉग पर आप आमंत्रित  हैं :)

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  6. सुंदर और सार्थक बाल रचना... बधाई आपको.

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  7. आप तो बाल कवितायें भी लाजवाब कह रहें हैं आज कल ...
    मज़ा आया दिनेश जी ...

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