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15 March, 2016

रविकर के चार दोहे

हुई लाल-पीली प्रिया, करे स्याह सम्भाव |
अंग-अंग नीला करे, हरा हरा हर घाव ||
एक दफ़ा गलती हुई,  रफा-दफ़ा कर रीस ।
 दफ़ा चार सौ बीस से, मत रविकर को पीस ||
युवा वर्ग से कर रही, दुनिया जब उम्मीद |
बहुतेरे सिरफिरे तब, मिट्टी करें पलीद ||
भट के फिर भटके कदम, दमन करे चहुँओर |
खौफ नहीं अल्लाह का, बन्दे आदमखोर ||



हुई पैदा सुता जबसे, खफा रहती हैं माँ तब से |
चटा देती नमक दादी, निकाली आह ना लब से |
उपेक्षित ही रही कन्या, मिले गम रोज ही सब से |
बचा दो जान बिटिया की, निवेदन कर रहा रब से ||


लगाए रोज झाड़ू वो, रसोई भी बनाती है |
कभी बर्तन कभी घर को, सफ़ा करती-कराती है |
निकाले वक्त पढ़ने का, बड़े कॉलेज जाती है |
बड़ी अच्छी है पढ़ने में, हमें टीचर बताती है || 

अधूरी है पढाई पर, बड़ी मुश्किल हैं सड़कों पे |
कसे फिकरे नजर गन्दी, नहीं बंदिश है लड़कों पे |
नजर नीची लगा ताला जुबां पे लौट आई है 
शिकायत क्या करे किसने, कहाँ पे कब कराई है ॥ 

सयानी हो गई अब तो, पढाई कर रही कब से |

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