27 June, 2016

उन्मुक्त दोहे -

भाषा वाणी व्याकरण, कलमदान बेचैन।
दिल से दिल की कह रहे, जब से प्यासे नैन।।

पानी मथने से नहीं, निकले घी श्रीमान |

साधक-साधन-संक्रिया, ले सम्यक सामान ||2||

लोरी-कैलोरी बिना, करते शिशु संघर्ष |

किन्तु गरीबी घट रही, जय जय भारतवर्ष ||3||

सकते में है जिंदगी, दिखे सिसकते लोग | 

भाग भगा सकते नहीं, आतंकी उद्योग ||4||

जो 'लाई' फाँका किये, रहे मलाई चाट |

कुल कुलीन अब लीन हैं, करते बन्दर-बाट ||5||

दूध फ़टे तो चाय बिन, दिखे दुखी सौ शख्स।

गाय कटे तो दुख कहाँ, दिया कसाई बख्स।6|

3 comments:

  1. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 29 जून 2016 को लिंक की गई है............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-07-2016) को "आदमी का चमत्कार" (चर्चा अंक-2390) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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