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23 August, 2016

मन के मनके जोड़, विहँसती चुपके चुपके -


चुपके से मन पोट ली, ली पोटली तलाश |
यादों के पन्ने पलट, पाती लम्हे ख़ास |
पाती लम्हे ख़ास, प्रेम पाती इक पाती |
कोरा दर्पण-दर्प, और फिर प्रिया अघाती |
शंख सीप जल रत्न, कौड़ियां गिनती छुपके |
मन के मनके जोड़, विहँसती चुपके चुपके ||

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (26-08-2016) को "जन्मे कन्हाई" (चर्चा अंक-2446) पर भी होगी।
    --
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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