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22 August, 2016

वह सागर सा गर शांत नही


धरती धरती गर धीर नहीं, सहती रहती यदि पीर नही ।

वह सागर सा गर शांत नही, नटनागर सा गमभीर नही।
कर शोषण दोहन मानव तो पहुँचाय रहा कम पीर नहीं।
जल वायु नहीं फलफूल नहीं, मिलते जड़ जीव शरीर नहीं।|

3 comments:

  1. बहुत कमाल है सर ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (26-08-2016) को "जन्मे कन्हाई" (चर्चा अंक-2446) पर भी होगी।
    --
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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