Follow by Email

17 August, 2016

रविकर के 51 दोहे

भाषा वाणी व्याकरण, कलमदान बेचैन।
दिल से दिल की कह रहे, जब से प्यासे नैन।।

 जब से झोंकी आँख में, रविकर तुमने धूल।
तुम अच्छे लगने लगे, हर इक अदा कुबूल।।

रस्सी जैसी जिंदगी, तने तने हालात |
एक सिरे पे ख्वाहिशें, दूजे पे औकात |
अगर वेद ना पढ़ सको, पढ़ो वेदना नित्य ।
कैसे हो मानव सुखी, करो वही फिर कृत्य ||

वक्त कभी भी ना दिया, रहे भेजते द्रव्य |
घड़ी गिफ्ट में भेज के, करें पूर्ण कर्तव्य ||

आहों से कैसे भरे, मन के गहरे जख्म ।
मरहम-पट्टी समय के, जख्म करेंगे ख़त्म ।।

 सोते सोते भी सतत, रहो हिलाते पैर |
दफना देंगे अन्यथा, क्या अपने क्या गैर ||

मुश्किल मे उम्मीद का, जो दामन ले थाम |
जाये वह जल्दी उबर, हो बढ़िया परिणाम ||

छलिया तूने हाथ में, खींची कई लकीर |
मैं भोला समझा किया, इनमे ही तक़दीर ||

करे बुराई विविधि-विधि, जब कोई शैतान |
चढ़ी महत्ता आपकी, उसके सिर पहचान ||

बंधी रहे उम्मीद तो, कठिन-समय भी पार |
सब अच्छा होगा जपो, यही जीवनाधार ||


गलती होने पर करो, दिल से पश्चाताप |
हो हल्ला हरगिज नहीं, हरगिज नहीं प्रलाप ||


नहीं कह रहा मैं इसे, कहता फौजी वीर |
अंदर के खंजर सहूँ , या सरहद के तीर ||

नहीं कह रहा मैं इसे, कह के गए बुजुर्ग |
जायज है सब युद्ध में, रखो सुरक्षित दुर्ग ||

नहीं कह रहा मैं इसे, कहें बड़े विद्वान |
लिए हथेली पर चलो, देश धर्म हित जान ||

नहीं कह रहा मैं इसे, कहते रहे कबीर |
क्या लाया क्या ले गया, यूँ ही मिटा शरीर ||

नहीं कह रहा मैं इसे, कह के गए वरिष्ठ |
हो अशिष्ट फिर भी सदा, करिये क्षमा कनिष्ठ ||

नहीं कह रहा मैं इसे, कहें सदा आचार्य |
बिना विचारे मत करो, रविकर कोई कार्य ||

नहीं कह रहा मैं इसे, कहे किसान मजूर |
राजनीति की रोटियां, सेंको नहीं हुजूर ||


पानी ढोने का करे, जो बन्दा व्यापार |
मुई प्यास कैसे भला, उसे सकेगी मार ||

प्रगति-पंख को नोचता, भ्रष्टाचारी-बाज |
लेना-देना कर रहा, फिर भी सभ्य-समाज ||

गुण-अवगुण की खान तन, मन संवेदनशील ।
इसीलिए इंसान हूँ, रविकर दिया  दलील ||

घना अँधेरा हो चुका, है मसान की शांति।
निश्चय ही प्रभु-कृपा से, होगी अब संक्रांति।।

भर जीवन करता रहा, रविकर जिनकी फ़िक्र |
कहीं भूल से भी नहीं, करते हैं वे जिक्र ||


सुने प्रशंसा मूर्ख से, यह दुनिया खुश होय |
डाँट खाय विद्वान की, रोष करे दे रोय |



जहाँ सटीक उपाय का, दारुण पड़े अकाल |
वहीँ समस्या शब्द भी, धरे रूप विकराल ||

मिलते दोस्त नसीब से, दिल से मिलता प्यार।
इज्जत मिलती कर्म से, हों सपने साकार।।


रहो होश में कह प्रिया, दिल से रही निकाल।
अब रहता औकात में, इक ठो पत्थर डाल।।


बढे रोस क्यूँ मित्रवर, क्यूँकर घटे भरोस।
रिश्ते की खातिर रखो, सम्यक जोश खरोस।


मुश्किल में मिलती मुझे, अच्छी बुरी सलाह।
किन्तु साथ तेरा भला, रविकर बन हमराह।


रोने को मिलता नहीं, इक कन्धा श्रीमान।
चार-चार कंधे मिले, जैसे निकली जान।।


सम्मुख मिश्री फिटकरी, दीखे एक समान।
इसमें तो धोखा छिपा, उससे क्या नुकसान।।


श्रीमति जब बोला करें, चुप रहिये श्रीमान।
किन्तु रहे जब शांत वह, लम्बी चुप्पी तान।


कुछ तो तेरे पास है, जिनसे वे महरूम।
निंदा करने दो उन्हें, तू तो निंदक चूम।।


मित्र पचासो लूँ बना, नहीं 'पचा सो' छोड़।
शुरू हुआ फिर डूबना, बचे मित्र बेजोड़।।


रविकर उनके साथ है, जिनका वक्त खराब।
जिनकी नीयत है बुरी, देता उन्हें जवाब।।


अर्थ पिता से ले समझ, होता क्या संघर्ष।
संस्कार माँ दे रही, जय जय भारत वर्ष।।


कड़ी बढ़ी लकड़ी सतत, जाती किन्तु घुनाय।
गगन अग्नि क्षिति जल पवन, मिटी जिंदगी हाय।।


चला पूत सिक्का खरा, खोटा अखरा हाय। 
समय बड़ा बलवान है, खोटा रहा लुभाय।


सहता द्वेष विषाद दिल, अंतस जलता जाय।
नहीं नियंत्रण अधर पर, सदा सतत मुस्काय।।


सागर पर वर्षा वृथा, ज्यों अमीर को भेंट।
कीमत क्या है अन्न की, जाने भूखा पेट।।


बना क्रोध भी पुण्य जब, झपटा गिद्ध जटायु। 
सहनशीलता भीष्म की, करे प्रदूषित वायु।



जले तेल बाती जले, बाता-बाती होय।
कहे लोग दीपक जले, समझ न आये मोय।।

तन्त्र-मन्त्र-संयन्त्र को, दे षडयंत्र हराय।
शकुनि-कंस की काट है, केवल कृष्ण उपाय।।

बारिस होती देख जब, पंछी रहे लुकाय।
बादल के ऊपर उड़े, बाज बाज ना आय।।

विकट-परिस्थिति तोड़ दे, अगर आत्म-विश्वास।
देखो व्यक्ति-विशेष को, तोड़ चुका जो फाँस।।

राजनीति जब वोट की, करें सिद्ध वे स्वार्थ |
राष्ट्र-नीति बीमार है, मोहग्रस्त है पार्थ ||

धनी पकड़ ले बिस्तरा, रखा चिकित्सक दूर
इक वकील लाया गया, रहे गिद्ध अब घूर ॥

घटी गाँव में नीम तो, कड़ुवाये हर गेह।
घटी मधुरता जीभ की, बढ़ी देह-मधुमेह।।

मरे कमर में बाँध बम, मात्र पैर सिर शेष |
मिली बहत्तर हूर तो, क्या करियेगा पेश ||

पैर गैर के क्यों पड़ें, आगे पैर बढ़ाय
प्राप्त सफलता खुद करें, धन्य-धान्य सुख पाय।।

मैय्यत में भी न मिलें, अब तो कंधे चार |
खुद से खुद को ढो रही, लगती लाश कहार ||

पानी मथने से नहीं, निकले घी श्रीमान |
साधक-साधन-संक्रिया, ले सम्यक सामान ||2||

लोरी-कैलोरी बिना, करते शिशु संघर्ष |
किन्तु गरीबी घट रही, जय जय भारतवर्ष ||3||

सकते में है जिंदगी, दिखे सिसकते लोग |
भाग भगा सकते नहीं, आतंकी उद्योग ||4||

जो 'लाई' फाँका किये, रहे मलाई चाट |
कुल कुलीन अब लीन हैं, करते बन्दर-बाट ||5||

दूध फ़टे तो चाय बिन, दिखे दुखी सौ शख्स।
गाय कटे तो दुख कहाँ, रहे कसाई बख्स।6|

जब से झोंकी आँख में, रविकर तुमने धूल।
अच्छे तुम लगने लगे, हर इक अदा कुबूल।।

चीनी सा रविकर गला, करता जल से नेह।
नुक्ता-चीनी जल करे, हुआ उसे मधुमेह।।

हुई लाल-पीली प्रिया, करे स्याह सम्भाव |
अंग-अंग नीला करे, हरा हरा हर घाव ||

एक दफ़ा गलती हुई,  रफा-दफ़ा कर रीस ।
 दफ़ा चार सौ बीस से, मत रविकर को पीस ||

युवा वर्ग से कर रही, दुनिया जब उम्मीद |
बहुतेरे सिरफिरे तब, मिट्टी करें पलीद ||

भट के फिर भटके कदम, दमन करे चहुँओर |
खौफ नहीं अल्लाह का, बन्दे आदमखोर ||

चाटुकारिता से चतुर, करें स्वयं को सिद्ध |
इसी पुरानी रीति से, माँस नोचते गिद्ध ||

अपने पे इतरा रहे, तीन ढाक के पात |
तुल जाए तुलसी अगर, दिखला दे औकात ||

बहुत व्यस्त हूँ आजकल, कहने का क्या अर्थ |
अस्त-व्यस्त तुम वस्तुत:, समय-प्रबंधन व्यर्थ ||

पक्के निर्णय क्यूँ करें, जब कच्चा अहसास।
कच्चे निर्णय क्यूँ करें, जब तक पक्की आस।।

नहीं हड्डियां जीभ में, किन्तु शक्ति भरपूर |
तुड़वा सकती हड्डियां, देखो कभी जरूर ||

नहीं सफाई दो कहीं, यही मित्र की चाह |
शत्रु करे शंका सदा, करो नहीं परवाह ||

बंधी रहे उम्मीद तो, कठिन-समय भी पार |
सब अच्छा होगा कहे, यही जीवनाधार ||

करे बुराई विविधि-विधि, जब कोई शैतान |
चढ़ी महत्ता आपकी, उसके सिर पहचान ||

बेलन ताने नारि तो, चादर तानें लोग |
ताने मारे किन्तु जब, टले  कहाँ दुर्योग ||

जीवन की संजीवनी, हो हौंसला अदम्य |
दूर-दृष्टि, प्रभु कृपा से, पाए लक्ष्य अगम्य ॥

धर्म होय हठधर्म जब, कर्म होय दुष्कर्म |
शर्म होय बेशर्म तब, भेदे नाजुक मर्म ||

अधिक आत्मविश्वास में, इस जग के सब मूढ़ |
विज्ञ दिखे शंकाग्रसित, यही समस्या गूढ़ ||

बढ़ जाती खुबसुरती, यदि थोड़ा मुस्काय |
फिर भी जाने लोग क्यूँ, लेते गाल फुलाय ||

वहम-अहम अतिशय विकट, सहम जाय इन्सान |
गहमागहमी में रहम, करना हे भगवान ||

सच्चा सौदागर बिका, सच्चा सौदा नाय ।
इस झूठे बाजार में, झूठा माल बिकाय॥

भाँय भाँय करता भवन, किन्तु भाय ना भाय ।
जब लुभाय ससुरारि तब, माँ भी धक्का खाय ॥

गैरों ने काटा गला, झटपट काम-तमाम ।
अपने तो रेता किये, लिए एक ही काम ॥

जाति ना पूछो साधु की, कहते राजा रंक |
मजहब भी पूछो नहीं, बढ़ने दो आतंक ||

 प्रभु से जो डरकर चले, होय नहीं पथभ्रष्ट |
किन्तु दुष्ट रोमांच हित, चले बाँटते कष्ट ||1||

"आकांक्षा के पर क़तर, तितर बितर कर स्वप्न |
दें अपने ही दुःख अगर, निश्चय बड़े कृतघ्न || 2||

माटी का पुतला पुन:, माटी में मिल जाय |
फिर भी माटी डाल मत, कर उत्थान उपाय ||3||

राजनीति जब वोट की, अपने अपने स्वार्थ |
संविधान बीमार है, मोहग्रस्त है पार्थ || 4||

जीवन की संजीवनी, हो हौंसला अदम्य |
दूर-दृष्टि, प्रभु कृपा से, पाए लक्ष्य अगम्य ||5||

धर्म होय हठधर्म जब, कर्म होय दुष्कर्म |
शर्म होय बेशर्म तब, भेदे नाजुक मर्म ||6||

देह नेह दुःख गेह है, किंचित नहिं संदेह |
देह चाहती मेह पर, होवे "रविकर"  *रेह ||8||
खार मिली हुई मिटटी / ऊसर

समझे मन के भाव को,  रविकर सत्य सटीक ।
कभी नहीं हैरान हो, ना रिश्तों में हीक ॥

बड़ी चुनौती है यही, सभी चाहते प्यार ।
किन्तु जहाँ  देना पड़े, झट करते तकरार ॥

है उदास दासत्व से, सो आवे ना रास |
है निराश मन सिरफिरा, करता त्रास हताश ||

जब चेतन चेतावनी, देते मनुज नकार |
दिखे चतुर्दिश *चेतिका , जड़ होव संसार ||
*श्मशान

थाली का बैगन नहीं , बैंगन की ही थाल |
जो बैंगन सा बन रहा, गली उसी की दाल ||

गिरेबान में झांक ले, हो सुधार शुरुवात ।
खुद से कर खुद-गर्ज तू , सुधरेंगे हालात ।।

सर्वगुणी भी भटकता, काम करे बेकाम ।
खलनायक से नीतिगत, बातें व्यर्थ तमाम ।।

छंद दिखे छल-छंद जब, संध्या जनित प्रभाव।
दृष्ट जलन्धर की गई, तुलसी प्रति दुर्भाव ।।

पुरंधरी पुरुषार्थ पर, रह जाती चुपचाप ।
  बंध्या का अपदंश सह, सहती रहती ताप ।।

सास रही कल तक बधू , जी में न संतोष ।
कुल की नभ्या बन गई, सुनो गर्व उद्घोष ।।

 मोटा दाहिज मिल गया, कुलक्षणा जो पूर्व ।
घर-भर की प्यारी बनी, दिव्या हुई अपूर्व ।।

पद पर पदतल पाय के, ढूंढे सच्चा भाव ।
रज-कण छाये मन-पटल, वो पहले बिलगाव ।।

गन्दाजल होती गजल, गन्दी हो जब सोंच ।
वाह वाह कर दो सखे, पाओगे उत्कोच ।।

चाहे जितनी जोर से, शब्द वाक्य लें चीख।
उससे भी ज्यादा प्रखर, कर्म चीखता दीख।

 पैसा भोजन सुख पचे, स्वस्थ सुखी हों आप |
अहंकार चर्बी बढ़े, बढ़े अन्यथा पाप |

 चुपके से मन पोट ली, ली पोटली तलाश |
यादों के पन्ने पलट, पाती लम्हे ख़ास |

रामनाम ही सत्य है, लाश रही थी बोल।
यह रास्ता पहचान ले, रविकर आँखे खोल।।

कसमसान रविकर बदन, कस मसान की आँच।
सारी दुनिया झूठ है, राम नाम ही साँच।।
कसमसान = rest less
कस= कैसी
मसान=श्मशान


औरों की खातिर दुआ, करना रोज जरूर।
कभी नहीं अपने लिए, फिर होगे मजबूर।।


जीवन तो यूँ ही चले, यही ब्रह्म आलेख।
झड़े पुराने पात सब, नई कोंपले देख।।

 
जीवन तो यूँ ही चले, यही ब्रह्म आलेख।
झड़े पुराने पात सब, नई कोंपले देख।।

 रविकर नहीं उछालिये, इज्जत पत्थर साथ।
इज्जत उछली तो गई, पत्थर फोड़े माथ।।

तुम तन्हा ज्यो छोड़ते, त्यों स्वावलंबन आय।
होती नित मजबूत मैं, चोट तुम्हारी खाय।।

 परहितकर कोमल हृदय, अंतर्मन श्रृंगार।
सुंदरता रविकर जँचे, आडम्बर बेकार।

उम्मीदों का बोझ दे, जीवन में अवसाद।
स्वीकारें जीवन यथा, प्रभु का मान प्रसाद।।

 मीरा शबरी पवनसुत, प्रेम प्रतीक्षा भक्ति।
पूर्ण समर्पण के बिना, मोक्ष न पाये व्यक्ति।

 कहते क्यूँ कर्तव्य तुम, परहित तो उल्लास।
भरे चित्त में हर्ष यह, स्वस्थ देह अहसास।।

 


सम्पूर्ण गीता सार (१९-दोहे)
अर्जुन उवाच-
भिक्षाटन करके जिऊँ, नहीं करूँ मैं युद्ध |
सरक रहा गांडीव मम, गुरुजन-स्वजन विरुद्ध ||1||

कृष्ण उवाच-
अजर-अमर आत्मा सदा, भक्ति-ज्ञान निष्काम |
करे कर्म निष्काम तो, पाए भगवद्धाम ||2||
चाहो सुख स्वाधीनता, निर्भरता अमरत्व |
जग से नाता तोड़ के, दे जग को हर तत्व ||3||
भोग लोक-परलोक में, किये हुवे निज कर्म |
कर्म करो संसार हित, नित्य-योग तव-मर्म ||4||
अर्जुन कर्म-सकाम को, बन्धन समझ परोक्ष |
ईश्वर सह संयोग से, कर्म दिलाये मोक्ष ||5||
प्रभु चरणों में हो सके, कभी नहीं लवलीन |
काम-क्रोध-मद-लोभ ले, ध्यानावस्था छीन ||6||
कोई दूजा है नहीं, एकमात्र भगवान् |
ऐसा जो अनुभव करे, पाए सम्यक ज्ञान ||7||
प्रभु-प्रति किंचित-प्रेम भी, कर दे बेड़ा पार |
हो निर्मल आनंद का, मन में यदि संचार ||8||
वशीभूत करके प्रकृति, रचूँ सतत यह सृष्टि |
परमात्मा निश्चय दिखें, भक्तिमयी यदि दृष्टि ||9||
प्रभु-प्रभाव जाने नहीं, बिना कृपा ऋषि देव |
करूँ कृपा जब भक्त पर, पाए ज्ञान स्वमेव ||10||
करता अर्जुन प्रार्थना, पाता चिन्मय दृष्टि |
विश्वरूप दर्शन करे, हुई कृपा की वृष्टि ||11||
सुमिरन कीर्तन वन्दना, श्रवण अर्चना दास्य |
पदसेवन नौ-साधना, आत्म-निवेदन सांख्य ||12||
होय भक्ति से भक्ति फिर, पैदा बारम्बार |
प्रेमलक्षणा भक्ति है, साध्य-भक्ति का सार ||13||
कर्म करे जैसे मनुज, वैसे फल का योग |
बार बार रे जीव तू, जन्म-मरण फल भोग ||14||
त्रिगुण सत्व रज तम सदा, रहे एक ही संग |
सत्वगुणी होता मनुज, ज्ञानमयी जब अंग ||15||
सबको भगवत-प्राप्ति का, है समान अधिकार |
हरदम सबके पास मैं, देखो हृदय-विदार ||16||
शास्त्रों के आधार पर, जीवन करो समृद्ध |
धारो कुल दैवीय गुण, लो आध्यात्मिक सिद्ध ||17||
जनमे निकृष्ट-योनि में, यदि निंदित आचार |
किन्तु होय रमणीय तो, हो भवसागर पार ||18||
शरणागत प्रभु के हुवे, तब चिंता क्यूँ तोय |
अब भी यदि चिंता करो, जान सके ना मोय ||19||


1 comment: