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02 September, 2016

रविकर के दो दर्जन दोहे

आसमान में दूर तक, तक तक हारा जंतु । 
पानी तो पूरा पड़ा, प्यासा मरा परन्तु । 

करे फैसला क्रोध यदि, वादा कर दे हर्ष।
शर्मसार होना पड़े, रविकर का निष्कर्ष।।

असफल जीवन पर हँसे, रविकर धूर्त समाज।
किन्तु सफलता पर यही, ईर्ष्या करता आज।।

विकट समस्या देख वो, गुणा-भाग कर भाग।
भाग-दौड़ कर भाग ले, रविकर पकड़ सुराग।।

भूख भक्ति से व्रत बने, भोजन बनता भोग।
पानी चरणामृत बने, व्यक्ति मनुज संयोग।।

दिन भर की आवारगी, एक बारगी माफ़।
दिन भर के बर्तन अगर, पति कर देता साफ़।।

रिश्ते 'की मत' फ़िक्र कर, यदि कीमत मिल जाय।
पहली फुरसत में उसे, देना तुम निपटाय।।

कई साल से गलतियाँ, रही कलेजा साल।

रविकर जब गुच्छा बना, अनुभव मिला कमाल।।

अनुभव का अनुमान से, हरदम तिगुना तेज।

फल बिखरे अनुमान का, अनुभव रखे सहेज।।

भोजन पैसा सुख अगर, नहीं पचाये जाँय |

चर्बी मद क्रमश: बढ़ें, पाप देह को खाँय ||

घडी-साज अतिशय कुशल, देता घडी सुधार |

बिगड़ी जब उसकी घडी, गया घड़ी सब हार ॥ 
जननी यदि कमजोर  है, हो  दुर्बल  संतान |
पर जननी मिट गई तो, करिहै का विज्ञान ||
बाल-पहेली -
रोटी खाई घास की, नहीं झुकाया माथ।
चबवाया नाकों चने, ले भीलों का साथ ।
बोलो बच्चों क्यों चुपचाप । 
चीर बघनखे से चखे, वीर जीत का स्वाद । 

रखे हिंदवी राज को, सदियों तक आबाद ॥ 
उत्तर दो या हारो बाजी । 
बाँध पुत्र को पीठ पर, पड़ी शत्रु पर टूट ।

एक अकेली क्या करे, हाय आपसी फूट । 
जरा नाम तो बोलो भाई । 
नजरबन्द क्योंकर रहें, पहुँच गए जापान |

फौज बना के जंग का, कर देते ऐलान ||
उत्तर दे करिये जयघोष |
कौआ कौआता रहा, कोयल चलती चाल |

अपने रख घोसले में, उसके गई निकाल |
उत्तर दो या खाओ डंडे ।

चलती दीखें पंक्ति में, चीनी उन्हें पसन्द। 

माने कुल संकुल नियम, तुम भी सीखो चन्द । 
उत्तर देकर करिये पी टी । 



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