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21 September, 2016

रविकर के दोहे

करे कदर कद देख के, जहाँ मूर्ख इंसान |
निरंकार-प्रभु को भला, ले कैसे पहचान ||

रोटी सा बेला बदन, अलबेला उत्साह |
माता हर बेला सिके, रही देह नित दाह ||

जो बापू के चित्र के, पीछे रही लुकाय।
वही छिपकली रात में, जी भर जीव चबाय ।।

दिल में ज्यों ज्यों उतरते, तरते जाते प्राण।
लेकिन दिल से उतरते, करते प्राण प्रयाण।।

संग एक पासंग है, रहा उसी से तोल।
इस पलड़े से बेच दे, ले दूजे से मोल।।

शूकर उल्लू भेड़िया, गरुड़ कबूतर गिद्ध।
घृणा मूर्खता क्रूरता, मद रति लोभ निषिद्ध।।

अदा अदावत की दिखी, खा दावत भरपूर।
अदा अदालत में करे, यह लत मूल्य जरूर।

धूल आँख में,झोंक के, ज्यों बिहसे उस्ताद।
भरा भरोसे से मनुज, झेले तब अवसाद।|

अजगर सो के साथ में, रोज नापता देह।
कर के कल उदरस्थ वह, सिद्ध करेगा नेह।।

खड्ग तीर चाकू चले, बरछी चले कटार।
कौन घाव गहरा करे, देखो ताना मार ।।

नोटों की गड्डी खरी, ले खरीद हर माल।
किन्तु भाग्य परखा गया, सिक्का एक उछाल।।
भले कभी जाता नहीं, पैसा ऊपर साथ।
लेकिन धरती पर करे, रविकर ऊँचा माथ।।
गम का ले अनुभव विकट, चलो तलाशें हर्ष।
करो भरोसा स्वयं पर, तब रविकर उत्कर्ष।।
घटना घटती घाट पे, डूब गए छल-दम्भ।
होते एकाकार दो, तन घटना आरम्भ।।
हीरा खीरा रेतते, लेते इन्हें तराश।
फिर दोनों को बेचते, कर दुर्गुण का नाश।।
तनातनी तमके तनिक, रिश्ते हुवे खराब।
थोडा झुकना सीख लो, मत दो उन्हें जवाब।।
धर्म-कर्म पर जब चढ़े, अर्थ-काम का जिन्न |
मंदिर मस्जिद में खुलें, नए प्रकल्प विभिन्न ||1||
मजे मजे मजमा जमा, दफना दिया जमीर |
स्वार्थ-सिद्ध सबके हुवे, लटका दी तस्वीर ||2||

3 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 22-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2473 में दी जाएगी
    धन्यवाद

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  2. बहुत बढ़ि‍या दोहा...

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