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05 September, 2016

रविकर के दोहे

जो बापू के चित्र के, पीछे रही लुकाय।
वही छिपकली रात में, जी भर जीव चबाय ।।

बेवकूफ बुजदिल सही, सही हमेशा पीर।
किन्तु रहा रिश्ता निभा, दिल का बड़ा अमीर।।

माटी का पुतला मनुज, माटी में मिल जाय।
पर पत्थर की प्रियतमा, नहीं सिकन तक आय।।

केले सा जीवन जियो, बनना नहीं बबूल |
नीति-नियम प्रतिबंध कुल, दिल से करो क़ुबूल ||

मुदित-मुदिर मुद्रा मटक, मुद्रा रही कमाय । 
जिला रही नश्वर-बदन, जिला-जवाँर घुमाय ।|

झूठे दो-दो चोंच कर, लड़ें चोंचलेबाज |
एक साथ फिर बैठते, करे परस्पर खाज ||

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (07-09-2016) को हो गए हैं सब सिकन्दर इन दिनों ...चर्चा मंच ; 2458 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सभी दोहे प्रहार करते हुए..ख़ास कर यह..


    जो बापू के चित्र के, पीछे रही लुकाय।
    वही छिपकली रात में, जी भर जीव चबाय ।।

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