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23 May, 2018

दोहे-

मार्ग बदलने के लिए, यदि लड़की मजबूर |
कुत्ता हो या मर्द हो, मारो उसे जरूर ||

हाथ मिलाने से भला, निखरे कब सम्बन्ध।
बुरे वक्त में थाम कर, रविकर भरो सुगन्ध।।

नंगे बच्चे को दिया, माँ ने थप्पड़ मार।
लेकिन नंगा आदमी, बच जाता हरबार।।

अजनबियों के शोर से, पड़े न जिसपर फर्क |
लेकिन उनके मौन से, गया कलेजा दर्क ||

संग जलेगा शर्तिया, रविकर आधा पेड़ |
एक पेड़ तो दो लगा, अब तो हुआ अधेड़ ||

रविकर के सँग भी जला, धुँआ धुँवा जब पेड़।
पेड़ लगाने चल पड़े, फिर तो कई अधेड़।।

कोयल कपट कुचाल को, सका न कौआ जान।
मीठी बोली पर फिदा, कर-नाटक नादान।।

लगे जिन्दगी बोझ जब, तन ढोना दुश्वार।
काम-क्रोध मद लोभ चढ़, बढ़ा रहे क्यो भार।।

तट पर तड़पे मीन-तन, गया उतर के ज्वार ।
भवसागर में दे तिरा, हो रविकर उद्धार।।

जहाँ मुसीबत खोल दे, कुछ लोगों की आँख 
आँख मूँद के मूढ़ मन, रहा वहीं पर काँख ||

धुवाँ-धुवाँ मुखड़ा लिए, रविकर-बँधुवा मुक्त |
बुद्धिजीवियों का मगर, बँधुवापन संयुक्त ||

साहस देती भीड़ यह, पर छीने पहचान।
बाहर निकलो भीड़ से, रहो न भेड़ समान।।

है पहाड़ सी जिंदगी, चोटी पर अरमान।
भ्रम-प्रमाद ले जो चढ़े, रविकर गिरे उतान।।

जब भी नाचें ख्वाहिशें, सत्ता खाये खार।
दे अनारकलियाँ चुना, बना बना दीवार।।

जिम्मेदारी की दवा, पीकर रविकर मस्त।
दौड़-धूप दिनभर करे, किन्तु न होता पस्त।।

मतलब के रिश्ते दिखे, ला मत लब पर नाम।
रिश्ते का मतलब सिखा, जाते दूर तमाम।।

दोनो हाथों से रहा, रविकर माल बटोर।
यद्यपि खाली हाथ ही, जाना है उस छोर।।

पैसे से ज्यादा बुरी, और कौन सी खोज |
किन्तु खोज सबसे भली, परखे रिश्ते रोज ||

हाथी तो हगकर हटे, करे नहीं परवाह |
किन्तु श्वान मल त्याग कर, रखे नाम की चाह ||

रविकर ख्वाहिश जिंदगी, शुरू हुई इक साथ।
दौड़ी जाए जिंदगी, मलें ख्वाहिशें हाथ।।

पैसे से ज्यादा बुरी, और कौन सी खोज |
किन्तु खोज सबसे भली, परखे रिश्ते रोज ||

काम नहीं छतरी करे, बारिश में कुछ खास।
विकट चुनौती हेतु दे, किन्तु आत्मविश्वास।।

सुबह-शाम सुलगा रहे, धूप-अगर-लुहबान |
मच्छर क्यों भागे नहीं, क्यों न दिखे भगवान् ||

चश्मे बदले धूप के, हर चश्मा रंगीन |
दिखे मात्र रंगीनियां, करें कर्म संगीन ||

रविकर सम्यक *धूप से, प्राप्त करे आनंद |
साधक पूजक कृषक तरु, करते सभी पसंद ||
*धूनी 
*धूपबत्ती 
*घाम 
*प्रकाश
सुखा रहा है धूप में, रविकर अपना स्वेद |
करे नहीं गलती मगर, माँगे क्षमा सखेद ||

तेज धूप वाष्पीकरण, फिर संघनन पयोद।
वर्षा से खिल-खिलखिला, हँसती माँ की गोद।।

चर्म-रोग संभावना, देती धूप बढ़ाय।
किन्तु विटामिन डी बिना, अस्थि टूट ही जाय।।

गम की तीखी धूप में, ठंडा पड़ता खून।
इसीलिए तो मिल रहा, दिल को गजब सुकून।।

रविकर करता धूप में, अपने केश सफेद।
दौड़-धूप कर जो करें, रँगते दिखे सखेद।।

छूकर निकली जिन्दगी, सिहरे रविकर लाश।
जख्म हरे फिर से हुए, फिर से मौत हताश।।

पहली कक्षा से सुना, बैठो तुम चुपचाप।
यही आज भी सुन रहा, शादी है या शाप।।

धत तेरे की री सुबह, तुझ पर कितने पाप।
ख्वाब दर्जनों तोड़ के, लेती रस्ता नाप।।

जल है तो कल है सखे, जल बिन जग जल जाय |
कल बढ़ते कल-कल घटे, कल-बल कलकलियाय |

गुजरे अच्छे दिन सभी, गुजरे समकालीन।
साक्ष्य पेश कैसे करूँ, हुवे स्वयं दिन दीन।।

रहा तरस छह साल से, लगे निराशा हाथ |
दिखी आज आशा मगर, दो बच्चों के साथ ||

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