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30 August, 2018

दोहे

जिसपर अंधों सा किया, लगातार विश्वास।
अंधा साबित कर गया, रविकर वह सायास।।

बीज उगे बिन शोर के, तरुवर गिरे धड़ाम।
सृजन-शक्ति अक्सर सुने, विध्वंसक कुहराम।।

सत्य प्रगट कर स्वयं को, करे प्रतिष्ठित धर्म।
झूठ छुपा फिरता रहे, उद्बेधन बेशर्म।।

दो अवश्य तुम प्रति-क्रिया, दो शर्तिया जवाब।
लेकिन संयम-सभ्यता, का भी रखो हिसाब।।

चींटी से श्रम सीखिए, बगुले से तरकीब।
मकड़ी से कारीगरी, आये लक्ष्य करीब।।

कुत्ते भागे दुम दबा, जूता काटे पैर।
नमो नमो जपते रहो, अपनों से क्या बैर।।

लफ्फाजी भर जिंदगी, मक्खी भिनके आज।
धू-धू कर जलती चिता, थू-थू करे समाज।।

झड़ी लगा उपदेश की, घन-गुरु करे कमाल।
रविकर कुल्हड़-बुद्धि तो, खाये किन्तु उबाल।।

रफ़्ता रफ़्ता जिन्दगी, चली मौत की ओर।
रोओ या विहँसो-हँसो, वह तो रही अगोर।।





2 comments:

  1. निमंत्रण विशेष :
    हमारे कल के ( साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक 'सोमवार' १० सितंबर २०१८ ) अतिथि रचनाकार जिनकी इस विशेष रचना 'साहित्यिक-डाकजनी' के आह्वाहन पर इस वैचारिक मंथन भरे अंक का सृजन संभव हो सका।

    आदरणीय "विश्वमोहन'' जी

    यह वैचारिक मंथन हम सभी ब्लॉगजगत के रचनाकारों हेतु अतिआवश्यक है। मेरा आपसब से आग्रह है कि उक्त तिथि पर मंच पर आएं और अपने अनमोल विचार हिंदी साहित्य जगत के उत्थान हेतु रखें !

    'लोकतंत्र' संवाद मंच साहित्य जगत के ऐसे तमाम सजग व्यक्तित्व को कोटि-कोटि नमन करता है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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