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22 May, 2011

सीख माँ की काम आये--

गर गलत घट-ख्याल आये,
रुत सुहानी बरगलाए 
कुछ कचोटे काट खाए,
रहनुमा भी भटक जाए
वक्त न बीते बिताये,
काम हरि का नाम आये- सीख माँ की  काम आये--
हो कभी अवसाद में जो,
या कभी उन्माद में हो
सामने या बाद में हो,
कर्म सब मरजाद में हो
शर्म  हर औलाद में हो,
नाम कुल का न डुबाये-
काम हरि का नाम आये- सीख माँ  की  काम आये--
कोख में नौ माह ढोई,
दूध का न मोल कोई,
रात भर जग-जग के सोई,
कष्ट में आँखे भिगोई
सदगुणों के बीज बोई
पौध कुम्हलाने न पाए
काम हरि का नाम आये- सीख माँ  की  काम आये--
(Zeal के लेखों से प्रेरित रचना)

3 comments:

  1. यार!

    चेहरा नजर नहीं आता ,

    या यूँ कहे कि बस चेहरा ही है चित्र में-------

    आजकल मुझे follow करने वाले बढ़ गए हैं

    कुछ और हेल्प कर दो

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  2. कोख में नौ माह ढोई,
    दूध का न मोल कोई,
    रात भर जग-जग के सोई,
    कष्ट में आँखे भिगोई
    सदगुणों के बीज बोई...माँ शब्द ही ..
    परमेश्वर के अषीम प्रेम का प्रतीक है....
    अति सुन्दर रचना ..
    सादर अभिनन्दन

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