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16 June, 2011

33 -साल बाद मिला पत्र

झुर-मुटों    में   बैठ  कर  नैना  लड़ाती |
वादियों  में  साथ  मिलकर गीत गाती |

रूठ  करके  मानती,  तुमको   मनाती |
पास   झूले   पर  बिठा  झूला  झुलाती |

साइकिल  पर संग सचमुच बैठ जाती |
और जाकर पार्क में पिकनिक मनाती--पर 
कैरियर  तो  है  नहीं ||  ठीक हूँ  बस  मैं  यहीं ||

पुस्तकों   में   प्रेम-पत्रों   को   रखा |
कुल्फियों का स्वाद ले संग में चखा 

याद  में  मैं  रतजगी  करती   रही |
प्यार  में जीती  रही,   मरती  रही |

डांट  भी दस बार घर में  खा चुकी | 
सांसारिक बात माँ समझा चुकी --के
कैरियर  तो है नहीं ||  ठीक हूँ बस मैं यहीं || 

8 comments:

  1. साइकिल पर संग सचमुच बैठ जाती |
    और जाकर पार्क में पिकनिक मनाती--
    कैरियर तो है नहीं || ठीक हूँ बस मैं यहीं |
    बहुत शानदार प्रस्तुति.

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  2. सच है, ये तो सोच में
    शामिल होना ही चाहिए ||
    व्यवहारिक होना बुरी बात नहीं||

    आभार ||

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  3. कैरियर तो है नहीं , ठीक हूँ बस मैं यहीं |
    बहुत सुंदर भोली भाली बचपन की कविता ,बहुत शानदार प्रस्तुति.

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  4. हाँ, इधर मन बड़ा आंदोलित और
    विक्षुब्ध था राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में.||

    सो एक हलकी-फुलकी मन को
    तसल्ली देने वाली रचना हो गई ||

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  5. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  6. आभार, आपका |
    अमृता तन्मय जी ||

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