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01 July, 2011

माननीय टिप्पणीकर्ता !

         (1)
पंचायत
जिसके परमेश्वर हैं पञ्च |
जो कराएँ पंचनामा 
करे प्रपंच--
शोभित  मंच ||
बड़े बंचक--
महा  टंच --
शर्म नहीं रंच || 
            (2)
तूने बड़ी भूल की,
जो दोस्ती क़ुबूल की |
था निठल्ला घूमता, 
व्यर्थ में मशगूल की ||
    (3)
जिंदगी जीते हैं, 
मदिरा पीते हैं |
भावों की क्या ?
घट-घट रीते हैं ||
   
           (4)
महफूज़ हम क्योंकर रखे 
अपना ईमान ?
सुन्दरता पर अपने करो जो, 
तुम गुमान ||
है तबीयत में तुम्हारे
इत्मीनान--
सितम सहते 
बंद कर अपनी जुबान ||

                   (5)
तू नहीं तेरी यादें हैं वो,
अधिक सताती हैं जो ||
                      (6) 

ऐसा उठा-उठा के पटका है मेरा दिल. 
लाखों  करम  हुए  पर  चूर  न हुआ ||

                    (7)
राजनेता और बेईमानी मस्त --
मीडिया  T R P  बढाने में व्यस्त 
कर्मचारी भ्रष्ट
चोरों की गस्त 
सज्जन त्रस्त 
सच्चाई अस्त |
और 
महंगाई ग्रस्त-- 
आम जनता पस्त 
झेले कष्ट |
प्रवक्ता व्यस्त --
बिदेशी हस्त ||

याद प्रिय आते रहो

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8 comments:

  1. भाई हमें तो सारे के सारे अच्छे लगे

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  2. बहुत सुन्दर व् सार्थक रचना प्रस्तुत की है आपने .आभार

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  3. क्रम लगाना कठिन प्रतीत हो रहा है.सभी अच्छी लगी .बहुत...

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  4. पंचनाम से दोस्ती कर मदिरा पी तबीयत व यादों की उठापटक नेता मस्त जनता त्रस्त

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  5. प्रिय रविकर जी सुन्दर रचना टिप्पणी में कर्म लगाना उचित नहीं वैसे जो अधिक भायीं ७-१-६ -
    लुटाते रहिये ऐसे ही -लुटने वाले की आँखें तो खुलें
    शुक्ल भ्रमर ५

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  6. टिप्पणी में क्रम पढ़ें कृपया
    हिंदी बनाने का उपकरण लगा अच्छा किया

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  7. जिसके परमेश्वर हैं पञ्च |
    जो कराएँ पंचनामा
    करे प्रपंच--
    शोभित मंच ||
    बड़े बंचक--
    महा टंच --
    शर्म नहीं रंच ||
    bahut sahi varnan kiya hai aapne aaj ke panch parmeshwar nahi rahe.

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  8. बहुत खूब रविकर जी .आभार

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