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05 July, 2011

दुबई में बारिस |

खिलखिलाकर वो हंसीना हंस पड़ी जब जोर से 
बिजलियों ने तड़प करके बादलों को खूब धोया |

बादलों के आंसुओं से  इस कदर सैलाब आया, 
सब्रका  झट बांध  टूटा  कि क़यामत आ गई || 

शुष्क  रेगिस्तान जलता, जलजले से यूँ  पटा , 
मस्त-काया सा भिगोया वो रुपहला बुर्ज दुबई | 

मोती मिला मानुष हिला कि चून गीला हो गया, 
जो  सून  बिन-पानी  रहे,  पानी  हुए  पानी  हुए |

वे  कंटीले  झाड़  सारे, खिलखिलाकर  हँस  पड़े,
खिल सकेंगे रेत में भी, इश्क के अरुणिम-गुलाब |

आस्मां  हरदम  जहाँ  होता  रहा था  आसमानी
पहली  दफा  वो  जिंदगी  में इन्द्र-धनुषी हो गया |

तेल  के  सूखे   कुएं   में   आज   पानी   जा  घुसा  
मंडूक  ने  टर-टर  सुनाई  मीन  प्यासी  मर  गई ||

 
                

19 comments:

  1. सच में बहुत सुंदर व अच्छी बात बतायी है।

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  2. सब कुछ फायदा तो नहीं हो सकता है.

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  3. बारिश का खूब नज़ारा दिखाया है ...

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  4. बहुत सुन्दर शब्द चित्र..

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  5. kavita me nyapan hai...bandishen na milte hue bhi prabhavshali rachna...

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  6. आस्मां हरदम जहाँ होता रहा था आसमानी
    पहली दफा वो जिंदगी में इन्द्र-धनुषी हो गया |
    bahut adbhut likhte hain aap badhai.

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  7. वाह ...लाजवाब प्रस्‍तुति ।

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  8. आस्मां हरदम जहाँ होता रहा था आसमानी
    पहली दफा वो जिंदगी में इन्द्र-धनुषी हो गया |

    जीवन को कितनी शिद्दत से अभिव्यक्त किया है ......!

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  9. तेल के सूखे कुएं में आज पानी जा घुसा
    मंडूक ने टर-टर सुनाई मीन प्यासी मर गई ||


    जीवन भी क्या विरोधाभास है .....!

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  10. बहुत अच्छी बातें बताई आपने | बहुत सुन्दर रचना |

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  11. बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण रेगिस्तान मे बारिश का क्या सुख मिलता होगा आपने एहसास करा दिया

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  12. मोती मिला मानुष हिला कि चून गीला हो गया,
    जो सून बिन-पानी रहे, पानी हुए पानी हुए |

    बहुत खूब...बधाई


    नीरज

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  13. आपने तो दुबई को अपने अंदाज़ मिएँ पेश कर दिया .. बहुत खूब ...

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  14. मस्त-काया सा भिगोया वो रुपहला बुर्ज दुबई |

    बुर्ज दुबई हो गया पानी पानी

    भविष्य का संकेत तो नहीं दे रहे आप !!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  15. बहुत सुन्दर

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  16. वाह क्या बात, बहुत सुंदर

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  17. खिल सकेंगें रेत में भी इश्क के स्वर्णिम गुलाब .सुन्दर बिम्ब .खामोश अदालत ज़ारी है ."-डॉ नन्द लाल मेहता वागीश .
    (पहली किश्त ). वाणी पर तो बंदिश है ,अब साँसों की बारी है ,
    खामोश अदालत ,ज़ारी है .
    हाथ में जिसके सत्ता है ,वह लोकतंत्र पर भारी है ,
    सभी सयानप गई भाड़ में ,चूहा अब पंसारी है .
    खामोश अदालत ज़ारी है .
    संधि पत्र है एक हाथ में ,दूजे हाथ कटारी है ,
    खौफ में औरत मर्द जवानी ,बच्चों की लाचारी है .
    खामोश अदालत ज़ारी है .
    (ज़ारी ....)
    सहभाव एवं प्रस्तुति :वीरेन्द्र शर्मा (veerubhai1947@gmail.com)

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