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10 July, 2011

प्रीत के गीत नहीं बिसराना,

सुन  लो  मेरे  मीत,  प्रीत  के  गीत  नहीं बिसराना,
अब अतीत की रीत, जीत कर भीत नहीं कहलाना |

व्यथा  कथाएं  कहते-कहते  हुई  लेखनी  कुंठित,
अब वियोग्मय रचनाएं तुम, 'रविकर' न रचवाना |

मन-मयूर मेरी  मद-मस्ती  मग-मग में महकाए,
मधु-मेधा मनहर  मन-मंदिर मानस पे छा जाना |

तेरे हित कल मैंने  स्वर-सरगम  था  शाश्वत छेड़ा,
नित-प्रति मधुरिम वाणी से संगीत सुधा सरसाना |

टूटा  मेरा  करकंगन   पर  नहीं   दुखी   है  मानस,
पल - पल  मेरे  प्यारे  प्रियतम,  ऐसे  ही  हरसाना ||

9 comments:

  1. व्यथा कथाएं कहते-कहते हुई लेखनी कुंठित,
    अब वियोग्मय रचनाएं तुम, 'रविकर' न रचवाना |
    bahut khoob likha hai

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  2. टूटा मेरा करकंगन पर नहीं है चिंतित मानस,
    पल - पल मेरे प्यारे प्रियतम, ऐसे ही हरसाना |
    बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति.

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  3. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

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  4. बहुत सुन्दर भावों को संजोया है आपने .आभार

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  5. कोमल कान्त पदावली मनहर भाव लिए आजाना दिन प्रति दिन रविकर ,सबको सरसाना .....

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  6. बहुत सुन्दर ..अनुप्रास अलंकार की छटा देखते ही बनती है ..

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  7. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति....

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  8. अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

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  9. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!
    शुभकामनायें.


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