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31 July, 2011

फिर से क्यूँ प्यार दिखाते हो ??

लम्बे-लम्बे  इन्तजार से, खुब  तड़पाते  हो |
गोदी में सिर रखकर प्रियतम गीत सुनाते हो |

देर  से  आने  की  झूठी,  सब - गाथा गाते हो,
पलकें पोल खोलती  फिर भी बात बनाते हो |

शब्दों  के तुम  बड़े  खिलाड़ी  भाव  जमाते हो
अवसर पाकर अंगुली पकड़ी "पहुंचा" पाते हो |

प्यासी धरती पर रिमझिम सावन बरसाते हो  
मन-झुरमुट में हौले से  प्रिय फूल खिलाते हो |

एक-घरी रुक के खुद को  जो  व्यस्त बताते हो,
अनमयस्क से इधर उधर कर समय बिताते हो |

रह-रह कर के  विरह-अग्नि बरबस भड़काते हो,          
रह-रह करके पल-पल तन-मन आग लगाते हो |


फिर  आने  का  वादा  करके  वापस  जाते हो,
वापस जाकर के फिर से क्यूँ प्यार दिखाते हो ??

* रुक-रुक कर /  साथ रहकर

17 comments:

  1. बहुत ही अच्छी रचना

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  2. एक अनुभूत सत्य से रु -बा -रु करवाती आशिक और माशूक की बात ,तदानुभूत हुए .http://veerubhai1947.blogspot.com/ कृपया यहाँ भी छेड़ करें .

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  3. आपकी पोस्ट की चर्चा सोमवार १/०८/११ को हिंदी ब्लॉगर वीकली {२} के मंच पर की गई है /आप आयें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएँ / हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। कल सोमवार को
    ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।

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  4. आज रांची प्रवास के मध्य में हूँ |
    एक मित्र के घर से आपका आभार कर रहा हूँ ||

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  5. सुन्दर रचना.....

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  6. ्बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  7. सुन्दर अभिव्यक्ति....
    सादर...

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  8. वाह बेहतरीन !!!!

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  9. बहुत सुन्दर ..बादलों से बहुत आत्मीयता से शिकायत की गयी है ..

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  10. खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  11. पलकें पोल खोलती फिर भी बात बनाते हो

    क्या बात है, बहुत खूब गुप्ता जी|

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  12. बातों बातों में सब कह दिया ,कृपया यहाँ भी पधारें .http://veerubhai1947.blogspot.com/

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  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति| बधाई स्वीकार करें|

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  14. सरल अभिव्यक्ति .....
    रचना अपने उद्देश्य में कामयाब है !
    हार्दिक शुभकामनायें आपको !

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