Follow by Email

02 August, 2011

अंत उफ़ आसान थोड़ा

गम भरा *गम-छा निचोड़ा,        *अंगौछा
बीच  में  ही *फींच छोड़ा |          * धोना

दर्द  रिश्ते  से  रिसा  तो,
खूबसूरत   मोड़   मोड़ा  |

चल न पाये दो कदम प्रिय

गिर गए  गम-*गोड़ तोड़ा |       *पैर

नौ दो ग्यारह हो गए-उफ़
किस तरह का जोड़ जोड़ा |

आज भी घूरे खड़ा  वह
राह  का   मगरूर  रोड़ा  |

धूप गम-छा क्या सुखाये-
घास का अब दोस्त घोड़ा |


इश्क की  फुन्सी हुई थी
बन  चुकी  नासूर-फोड़ा |

घूर "रविकर" घूर ले तो     
अंत उफ़ आसान थोड़ा ||

घूर = घूमने के अर्थ में बहुधा प्रयुक्त होता है भोजपुरी मे,

17 comments:

  1. बहुत ही अलग अन्दाज़ की प्यारी रचना।

    ReplyDelete
  2. वाकई बहुत सुंदर रचना है

    ReplyDelete
  3. धूप गम-छा क्या सुखाये-
    घास का अब दोस्त घोड़ा |

    इश्क की फुन्सी हुई थी
    बन चुकी नासूर-फोड़ा |

    ..bahut badiya anuthi rachna..

    ReplyDelete
  4. यही कहूँगा बस.....माशा अल्लाह ....

    ReplyDelete
  5. मन को छूती रचना |
    आशा

    ReplyDelete
  6. मन को छूती रचना |
    आशा

    ReplyDelete
  7. इश्क की फुन्सी हुई थी
    बन चुकी नासूर-फोड़ा |
    वाह ...क्या बात है जी ...दिल के पुराने घाव को उकेरती हुई सी लेखनी .....बहुत खूब

    ReplyDelete
  8. खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  9. छंद निर्वाह के साथ साथ शब्दों के सुंदर प्रयोग
    बधाई रविकर जी

    ReplyDelete
  10. वाकई बहुत सुंदर रचना है

    ReplyDelete
  11. बहुत सामयिक और अपने समय की गुहार है यह खूबसूरत ग़ज़ल आपकी ,आपकी ही तरह .आप से भी खूबसूरत ,आप के अंदाज़ हैं .......
    दर्द रिश्तों से रिसा तो खूब सूरत ,मोड़ मोड़ा ,
    इश्क की फुंसी हुई थी ,बन चुकी नासूड़ फोड़ा . ,एक एक अश -आर मर -बे-हवा ,काबिले दीद ,वाह क्या कहने हैं रविकर भाई हमारे के .ग़ज़ल का गोदाम हैं आप हुज़ूर ,चिनिया बादाम हैं .

    ReplyDelete
  12. धूप गम-छा क्या सुखाये-
    घास का अब दोस्त घोड़ा |..बहुत खुबसूरत प्रस्तुति..धन्यबाद..

    ReplyDelete
  13. nayaapan liye huye ek rachna....


    http://teri-galatfahmi.blogspot.com/

    ReplyDelete
  14. रचना का तीखापन पसंद आया ! हार्दिक शुभकामनायें आपको !

    ReplyDelete