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11 July, 2011

फिर भी कोई कमी काल सी कसक रही है

बंजर   धरती   से  मैंने   सोना  उपजाया,
कूप और नलकूपों का इक जाल बिछाया || 

जीवन भर ढोया पानी, फिर भी प्यासा मै,
जीवन - संध्या की हूँ , घनघोर निराशा मै ||

देख - भालकर  ही  मैंने  हर  कदम  उठाया 
भटक  रहे  हर राही  को, सदमार्ग दिखाया ||

कस्मे-वायदे-प्यार-वफ़ा  की करी बंदगी 
पर-सेवा, पर-हितकारी  यह रही जिंदगी ||

फिर भी कोई कमी काल सी कसक रही है
अंतस में अन्जानी चाहत  सिसक रही है ||

8 comments:

  1. जीवन भर ढोया पानी, फिर भी प्यासा मै,
    जीवन - संध्या की हूँ , घनघोर निराशा मै ||


    ऐसी निराशा भरी बातें भला क्यों ? आपमें सार्थक उर्जा है ...सुन्दर प्रस्तुति

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  2. वाह ... यहाँ तो नया रूप है आपका ..
    बहुत खूब लिखते हैं आप ...

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  3. रचना में निहित भावना प्रेरक है।

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  4. फिर भी कोई कमी काल सी कसक रही है ,अंतस में अनजानी चाहत सिसक रही है .सुन्दर अमन के आलोडन की सार्थक उत्प्रेरक रचना .

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  5. जीवन भर ढोया पानी, फिर भी प्यासा मै,
    जीवन - संध्या की हूँ , घनघोर निराशा मै ||
    ਰਵਿਕਰ ਜੀ , ਬਧਿਯਾ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਹੈ ਵਿਚਾਰਾਂ ਦੀ ਫੁਲਕਾਰੀ ਫ਼ਬ ਰਹਿਯਾਂ ਨੇ , ਧਨਵਾਦ ਜੀ /

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  6. जीवन भर ढोया पानी, फिर भी प्यासा मै,
    जीवन - संध्या की हूँ , घनघोर निराशा मै ||

    sunder prastuti
    kahi dur man me koi kasak reh gayi hai shayed ........bhaupurn rachna ke liye badhai

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  7. फिर भी कोई कमी काल सी कसक रही है |
    अंतस में अनजानी चाहत सिसक रही है |

    ......................यही अपूर्णता ही तो सम्पूर्णता की ओर ले जाती है

    .अन्जानी चाहत.........................'मत बुझाओ प्यास मेरी ,प्यास मेरी जिंदगी है
    प्यास में विश्वास है, विश्वास मेरी जिंदगी है '

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  8. मन को छूने वाली भावपूर्ण अतिसुन्दर भावाभिव्यक्ति....

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