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19 September, 2011

अब जेल में भी मस्त गाने गा रहा है राक्षस ||

आखेट मानव का सदा, करता रहा है राक्षस,
तो माँस-मदिरा से उदर, भरता रहा है राक्षस, 

उस गाँव का तब एक बन्दा जान देता था वहाँ--
किन्तु गुच्छों में निवाला,  खा  रहा  है  राक्षस |  

हाथ करते हैं खड़े जमुना में इच्छा शक्ति धो--
सुरसा सरीखा मुँह  दुगुना, बा रहा है राक्षस |

मौत ही सस्ती हुई, हर जीन्स महँगा बिक रहा -
हर एक बन्दे को इधर अब भा रहा है राक्षस |

ताज की हलचल से आया था कलेजा मुँह तलक-
तो जेल में भी मस्त गाने गा रहा है राक्षस || 



7 comments:

  1. मौत ही सस्ती हुई, हर जीन्स महँगा बिक रहा -
    हर एक बन्दे को इधर अब भा रहा है राक्षस |
    महंगाई का राक्षस सचमुच मौत सस्ती किये दे रहा है । एक अलग सी किंतू झकझोर देने वाली कविता ।

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  2. ताज की हलचल से आया था कलेजा मुँह तलक-
    अब जेल में भी मस्त गाने गा रहा है राक्षस ||
    सार्थक वातावरण प्रधान काव्यात्मक प्रस्तुति .राजनीतिक दुरावस्था का सटीक चित्रण .
    Tuesday, September 20, 2011
    महारोग मोटापा तेरे रूप अनेक .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

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  3. ह्र्दय की गहराई से निकली अनुभूति रूपी सशक्त रचना

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  4. वाह ये चित्रमय लाजवाब रचना ... हर शेर कटाक्ष है ...

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  5. एकदम निशाने पर ही तीर मारा है .....लाजबाब शेर

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  6. एक एक सब्द सटीक सार्थक सत्य....

    बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर,प्रभावशाली रचना...

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  7. अच्छे चित्र अच्छी रचना |
    आशा

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