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05 October, 2011

दस सिर सहमत नहीं रहे थे |

 लंका-नगरी बैठ दशानन त्रेता में मुस्काया था |
बीस भुजाओं से सिर सारे मन्द मन्द सहलाया था ||
सीता ने तृण-मर्यादा का जब वो जाल बिछाया था-
बाँये से पहले वाला सिर बहुत-बहुत झुँझलाया था |
ब्रह्मा ने बाँधा था ऐसा, कुछ  भी  ना  कर पाया था |
 असंतुष्ट  हो  वचन  सहे  थे |
दस सिर सहमत नहीं रहे थे ||
[2.jpg]
दहन देख दारुण दुःख लंका दूजा मुख गुर्राया था |
क्षत-विक्षत अक्षय को देखा गला बहुत भर्राया था |
अंगद के कदमों के नीचे तीजा खुब  अकुलाया था |
पैरों ने जब भक्त-विभीषण पर आघात लगाया था |
बाएं से चौथे सिर ने नम-आँखों, दर्द  छुपाया था-
भाई   ने   तो   पैर   गहे   थे |
दस सिर सहमत नहीं रहे थे ||
सहस्त्रबाहु से था लज्जित दायाँ वाला पहला सिर |
दूजे  ने  रौशनी  गंवाई  एक आँख  बाली  से घिर |
तीजा तो बचपन से निकला महादुष्ट पक्का शातिर |
मन्दोदरी से चौथा चाहे  बातचीत हरदम आखिर |
पर  सबके  अरमान  दहे  थे |
दस सिर सहमत नहीं रहे थे ||
File:Sita Mughal ca1600.jpg[bhrun-hatya_417408824.jpg]
शीश नवम था चापलूस बस दसवें की महिमा गाये |
दो पैरों  के, बीस  हाथ  के,  कर्म - कुकर्म  सदा भाये |
मारा रावण राम-चन्द्र ने, पर फिर से वापस आये |
नया  दशानन  पैरों  की  दस  जोड़ी  पर सरपट धाये |
दसों दिशा में बंटे शीश सब, जगह-जगह रावण छाये -
सब सिर के अरमान लहे थे |
दस सिर सहमत नहीं रहे थे ||
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/c/ce/Mohammed_Ajmal_Kasab.jpg Train inferno: Burning oil tankers after a tanker train caught fire following derailment near Chanmana village between
Aluabari and Mangurjaan railway stations in Kishanganj district of Bihar on Wednesday.

20 comments:

  1. बहुत ही धमाकेदार प्रस्तुति....झंडा गाड़ दिया रविकर भाई !

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  2. सही कहा आपने शत प्रतिशत सहमत .....

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  3. kyaa baat hai , badhaayee

    raavan ke saron kee peedaa ke parisheelan srijan

    gazab kee kalpnaa hai ,aapkee lekhnee se yathrth

    men bah rahee hai kavitaa ,raamraaj kaa dansh

    sah rahee hai kavitaa .

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  4. बहुत खुबसूरत.... सुगढ़ रचना....

    विजयादशमी की सादर बधाईयाँ....

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  5. विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह पर्व, सभी के जीवन में संपूर्णता लाये, यही प्रार्थना है परमपिता परमेश्वर से।
    नवीन सी. चतुर्वेदी

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  6. विजयादषमी की हार्दिकष्षुभकामनाए रावण के दस सिर आज भी हमारे समाज की बुराईयों के प्रतीक है ।

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  7. आपके गहन विचार ,तर्क सर्वकालिक है,सत्य भी है असहमति ही असफलता को आमंत्रित करती है,कदाचित, सहमति की परिभाषा समझ में न aye , शुक्रिया जी /

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  8. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच 659,चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  9. गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ ज़बरदस्त प्रस्तुति!
    विजयादशमी पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं।

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  10. This comment has been removed by the author.

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  11. Hats Off!!
    kalyug me vyapt har tarah ki kuritiyon per sundar katakch!

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  12. आपकी लेखनी को नमन.

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  13. रावण के दसों सिरों की गाथा और उनकी असहमती की कथा खूब जमाई आपने । बधाई हो रविकर जी ।

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  14. रावण के दसों सिरों की गाथा और उनकी असहमती की कथा खूब जमाई आपने । बधाई हो रविकर जी ।

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  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति .प्रतीकात्मक चित्र .

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  16. kuch alg...kuch hat kar hai ...aabhar

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