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08 October, 2011

दीपक बाबा की प्रेरणा से -- बक बक

निर्बुद्धि की जिन्दगी, सुख-दुःख से अन्जान |
निर्बाधित जीवन जिए,  डाले  न व्यवधान  ||

बुद्धिमान करता रहे , खाकर-पीकर मौज |
एकाकी जीवन जिए, नहीं  बढ़ाये  फौज ||
http://4.bp.blogspot.com/_dhoMIsj0SUU/TVIuCd3zIdI/AAAAAAAAHLY/EDNVDat6MJA/s1600/a_mayawati_0414.jpg
बुद्धिवादी परिश्रमी,  पाले  घर  परिवार |
मूंछे  ऐठें  रुवाब से,  बैठे  पैर  पसार  ||
बुद्धिजीवी  का  बड़ा, रोचक  है  अन्दाज |
जिभ्या ही करती रहे, राज काज आवाज ||
Former Chief Minister of Madhya Pradesh and Congress leader Digvijay Singh gestures during an interview, in New Delhi on March 26, 2009.
बुद्धियोगी  हृदय  से,  लेकर  चले समाज |
करे भलाई जगत का, दुर्लभ हैं पर आज ||
Anna Hazare and Mahatma Gandhi


10 comments:

  1. बेमतलब कहाँ , बड़े काम की बक -बक!

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  2. sahi kaha...kabhi kabhi bematlab ki bat bhi bade matlab liye huye hoti hai

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  3. सबसे भले बिमूढ़, जिन्हें ना व्यापत जगत गति.

    बढ़िया दोहे काम की बात. बधाई सुंदर प्रस्तुति के लिये.

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  4. निर्बुद्धि की जिन्दगी, सुख-दुःख से अन्जान |

    अपुन का तो यही सत्य है...

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  5. अति सार्थक बकबक है, सिखलाते है मर्म |
    सरसता क्या जीवन की, क्या जीवन का धर्म ||

    सार्थक प्रस्तुति रविकर जी...
    सादर बधाई...

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  6. बधाई सुंदर प्रस्तुति के लिये.

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  7. badhaayee ravikar ji
    aapke dohe man na mohe ,mumkin naheen
    satya dohon men kaun rachtaa hai kaheen
    vaastav men sundar dohe
    laalsaa hai anvarat sach lekhni chaltee rahe .

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  8. बुद्धियोगी हृदय से, लेकर चले समाज |
    करे भलाई जगत का, दुर्लभ हैं पर आज ||

    .......... आभार।
    सही विवेचना की है आपने ।

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