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09 February, 2012

अस-लीले गुर कुर्सियाँ, कर-नाटक असलील-

अस-लीले गुर कुर्सियाँ, कर-नाटक असलील ।
खादी ओढ़े भेड़िया,  बड़ा करेक्टर ढील ।

बड़ा करेक्टर ढील, "नील" हॉउस को करते ।
नंगे सभी हमाम,  मगर मेला में डरते ।

चारित्रिक यह पतन,  करे सबको शर्मिंदा ।
 छलनी करे करेज, करो खुब इसकी निंदा ।। 


ZEAL पर
मेरी यह टिप्पणी

पालिटिक्स में कपि-पिला , बड़ा पिलपिला मल्ल ।
छिद्र सूप का देख के, हो चलनी सम गल्ल ।

हो चलनी सम गल्ल, कुटिल सिब-बल जो पाए ।
होवे कभी न हल्ल, चाल फिर नई चुराए ।

नारायण जस प्यार, भूलता बीबी-बिटवा।
करे इसे स्वीकार, मगर दूजों से शिकवा ।।

3 comments:

  1. बढ़िया तानाकशी...

    :-)

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  2. बहुत सुन्दर कटाक्ष उम्दा रचना के साथ ।

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  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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