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09 March, 2012

चूहे रहे मुटाय, आलसी बने निगोड़े-

डालें दिन में दस दफा, बिना भूख के अन्न ।
पेटू भोजन-भट्ट का, धर्म-कर्म संपन्न ।

धर्म-कर्म संपन्न, बैठ के रोटी तोड़े ।
चूहे रहे मुटाय, आलसी बने निगोड़े ।

 चूहा भी खुशहाल, चार का दाना खाले ।
वहाँ भूख से मौत, यहाँ लत डेरा डाले ।।    
  

6 comments:

  1. मोटे चूहे,बिल्ली मोटी
    अपनी तो पहचान है छोटी !!

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. वाह! सुन्दर कुण्डलिया...
    सादर बधाई.

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  4. आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स वीकली मीट (३४) में शामिल की गई है /आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आप इसी तरह मेहनत और लगन से हिंदी की सेवा करते रहें यही कामना है /आभार /लिंक है
    http://hbfint.blogspot.in/2012/03/34-brain-food.html

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