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16 March, 2012

सस्ता हुआ नमक, छिड़क दें जैसे सिसके

खुला पिटारा प्रणव का, मौनी देते दाद ।
महँगाई से त्रस्त जन, डर डर देते पाद ।

दर दर देते पाद, धरा नीचे से खिसके ।
सस्ता हुआ नमक, छिड़क दें जैसे सिसके ।

दो प्रतिशत दे और, जरा सा सह ले यारा ।
छिना और दो कौर, पीटता खुला पिटारा ।।  

6 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. छीज रहा है पल-पल जीवन
    राहत की उम्मीद लिए
    ठगी गई जनता ही हरदम
    हेर-फेर जितने भी किए!

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  3. बहुत सटीक ..
    बढिया लिखा है !!

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  4. क्या बात है जी ! बहुत खूब! नमक ही तो छिड़कना रह गया है ......./

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  5. बढिया लिखा है !!

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  6. खुला पिटारा प्रणव का, मौनी देते दाद ।
    महँगाई से त्रस्त जन, डर डर देते पाद ।
    यही बजट का सार है सुन लो मेरे यार ,

    कर सकते , तो करो ,इनका बंटा- धार

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